Thursday, August 28, 2008

धर्मशाला मैक्लोडगंज की तस्वीर.....

मैक्लोडगंज की ये फोटो देखिये फोटो दूर से ली गई है। इसमें तिब्बती मठ के साथ पूरा मैक्लोडगंज नजर आ रहा है।

Monday, August 25, 2008

छोटे ल्हासा मैक्लोडगंज धर्मशाला की सैर (१)

कश्मीर से घूम कर आये लगभग दो महीने होने वाले थे। मेरा मन फिर कही जाने के लिए मचलने लगा था । तभी अगस्त में दो तीन दिन की छुट्टी भी मिल गई। अब तो मैं आस पास जगह तलाश करनें लगा जहां घूमने जाया जा सके। काफी दिनो से मेरा मन हिमाचल जाने का कर रहा था तो मैने धर्मशाला जाना तय किया। एक दोस्त भी चलने को तैयार हो गया।

हिमाचल पर्यटन के दिल्ली आफिस में फोन कर सारी जानकारी ले ली। हम दोनो तेरह की शाम को धर्मशाला के लिए निकल पडे। लेकिन मेरे दोस्त सुभाष को अपने आफिस से निकलने में देर हो गई। शाम को सात के बाद ही हम निकल पाये।
मैं पहले पता कर चुका थी कि आठ बजे वोल्वो बस चलती है लेकिन देर से निकलने के कारण हम उस में नहीं जा पाये। बस अड्डे पर पता चला कि अब तो हिमाचल की साधारण बस सेवा में ही जाना होगा। लगभग तेरह घंटे की यात्रा थी लेकिन जाना तो था ही इसलिए बैठ गये ।

करीब नौ बजे हमारी बस चल पडी। दिल्ली से निकलते ही मौसम नें रंग बदलना शुरु कर दिया और तेज बरसात होने लगी। रात को करीब दो बजे हम लोग चंडीगढ पहुंच गये। चंडीगढ के बाद तो मुझे नींद आने लगी था जब आंख खुली तो पता चली कि हम हिमाचल में उना से आगे निकल चुके हैं। थोडी ही देर में पहाड भी शुरु हो गये। हांलाकि बरसात को रुक चुकी थी लेकिन पहाड अभी भी भीगे हुए थे।

बस से हरी भरी वादियों को देखना आखो को चैन दे रहा था। मन में खुशी हो रही थी कि एक बार फिर में दिल्ली की दौड भाग से दूर आ गया हूँ। रास्ते में नौ देवियों में से एक चिन्तपूर्णी देवी का मन्दिर भी पडा।
आखिर कार करीब सुबह के दस बजे हमारी बस धर्मशाला पहूँच ही गई। लेकिन हमारी मंजिल ये नहीं थी ब्लकि हमें तो बहां से दस किलोमीटर दूर मैक्लोडगंज जाना था । जहां दलाई लामा रहा करते हैं।

दरअसल धर्मशाला के दो हिस्से हैं एक है निचला धर्मशाला जो करीब तेरह सौ मीटर की उँचाई पर है और दूसरा है ऊपरी धर्मशाला जो करीब अठारह सौ मी़टर की ऊँचाई पर है। ऊपरी धर्मशाला में साठ के दशक में तिब्बत से निर्वासित तिब्बती लोग रहे है जो कि दलाई लामा के साथ भारत आ गये थे। ज्यादातर पर्यटक ऊपरी धर्मशाला में ही जाते हैं क्योकि वहां अलग तरह कि बौद्द संस्कृति देखन को मिलती है। इसी ऊपरी धर्मशाला को मैक्लोडगंज कहा जाता है।



तो हमे धर्मशाला के बस अड्डे से ही मैक्लोडगंज के लिए बस मिल गई। रास्ता बेहद ही खूबसूरत था पूरा इलाका ही देबदार और चीड के जंगलों से भरा पडा है। आधे ही घंटे में हम मैक्लोडगंज आ गये। हल्की हल्की बरसात भी होने लगी थी कुल मिलाकर पहाड पर मस्ती करन का पूरा माहौल था वहा पर।



सबसे पहले तो हमने होटल लेने की सोची। दिल्ली से ही हिमाचल पर्यटन के होटल भागसू के बारे में पता कर लिया था । इसलिए बस से उतरते ही होटल के लिए चल पडे को बस अ़ड्डे से पास ही था। होटल पहाड के एक किनारे पर देवदार के जंगल के बीच बना था इतनी शानदार जगह थी कि होटल के एरिया में घुसते ही मन खुश हो गया।




हमें एक कमरा भी वहां मिल ही गया एक ही खाली था। कमरा लेकर हम थोडी ही देर मे तैयार हो गये धर्मशाला को छानने के लिए। लेकिन तब तक इतनी तेज बरसात होने लगी कि बाहर निकलना मुश्किल हो गया । तो क्या करते बालकनी मे बैठकर ही निहारने लगा। खैर दो बजे तक बरसात हल्की होने लगी तो हम बाहर निकले।
होटल से पता किर लिया था कि आस पास क्या है देखने के लिए । बाहर आकर फिर से हम बस अड्डे पर आये ये यहा का मुख्य इलाका है जहां से घूमने के लिए टैक्सी या ओटो लिया जा सकता है। ये बहुत ही छोटी जगह है और पैदल भी घूमा जा सकता है। लेकिन बरसात के कारण हमने एक ओटो कर लिया । पहली बार किसी हिल स्टेशन पर मैं ओटो देख रहा था इसलिए ओटो ही कर लिया घूमने के लिए।


ओटो से घूमने के लिए तीन सौ और टैक्सी से करीब चार सौ रुपये लगते हैं। हम ओटो से निकल पडे मैक्लोडगंज की सैर पर , पहाड पर ओटो सो घूमने में अलग ही मजा आ रहा था। हरे भरे देवदार के जंगल के बीच से होते हुए हम सबसे पहले पहुँचे नडी गांव।ये गांव करीब दो किलोमीटर दुर है। अगर आप पैदल जाना चाहें तो जा सकते हैं।


उस गांव से उँचे पहाडों का सुन्दर नजारा देखने को मिलता है इसलिए पर्यटन विभाग गांव को विकसित कर रहा है। वाकई यहां से सामने के ऊंचे पहाडो का बढिया नजारा हमें देखन को मिला। हल्की बरसात में हम पास के जंगल की सैर पर निकल गये ।



थोडी देर तक नजारे लेकर हम चले अगली मंजिल डल लेक की तरफ ये एक छोटी सी झील है । झील छोटी जरुर है लेकिन चारो तरफ से देवदार के जंगल से घिरी है । झील के चारों तरफ घूमने के लिए रास्ता बनाया गया है। झील में आस पास के कई झरनो का पानी मिलता है। हल्की बरसात औऱ झील का किनारा माहौल को रोमांटिक बना रहा था।




झील को देखने के बाद हम चले सेंट जान चर्च को देखने के लिए। इस चर्च को अठारह सौ बावन में बनाया गया था। ये उत्तर भारत के सबसे पुराने चर्च में से एक हैं । छोटा सा चर्च बाकई देखने के लायक है । घने जंगल से घिरा है चर्च का पूरा इलाका।


चर्च बंद होने के कारण हम इसके अंदर नहीं जा सके लेकिन चर्च की खिडकियो में स्टेंड ग्लास की सुन्दर काम किया गया है। इसे देखन के लिए आप को रविवार को जाना होगा क्योकि रविवार को पूजा के लिए चर्च खुलता है।

चर्च में एक पुराना कब्रिस्तान भी है जिसकी खासियत ये है कि यहां भारत के वायसराय लार्ड एल्गिन को दफनाया गया है जिनकी अठारह सो तिरेसठ में घोडे से गिरकर मौत हो गई थी। ये चर्च धर्मशाला और मैक्लोडगंज के रास्ते के बीच में है।



अब हम चले भागसू नाग मन्दिर देखने के लिए जो कस्बे से एक किलोमीटर की दूरी पर है। भगवान शिव के इस मन्दिर की बहुत मान्यता है। मन्दिर के पास की झरना निकलता है जिसे पवित्र माना जाता है। मन्दिर से सामने की घाटी का सुन्दर नजारा देखने को मिलता है।





मन्दिर से करीब डेढ किलोमीटर की चढाई के बाद एक और झरना है। बरसात के मौसम में तेजी से गिरते पानी को देखना मन में रोमांच भर देता है। झरने के तेजी से गिरते पानी ने धुंध बना रखी थी। वहां पहुचते ही पानी में घुस कर फोटो खिंचवाये। झरने के पानी में भीगते भीगते ही फोटो खिचवाये और वापस चल पडे।




झरने को देखने के बाद हमारा अगला ठिकाना था नामग्याल मठ जिसे तिब्बत से आये लोगों ने बनाया है। इस मठ के साथ मैक्लोडगंज की जिंदगी का पूरा सफर अगली बार..........

Thursday, August 7, 2008

जलता जम्मू और मस्त सरकार.......

पिछले एक महीने से जम्मू जल रहा है और हमारी केन्द्र सरकार मस्ती से सो रही है। अभी तक तो सुना ही था कि रोम जल रहा था और नीरो बांसुरी बजा रहा था लेकिन अब तो ये सामने ही दिखाई दे ऱहा है।
गौर किजीए की एक तरफ हैं हाथ में भारत का झंडा यानि कि तिरंगा हाथ में लिए भारत माता कि जय के नारे लगाते लोग जो अपने हक की आवाज उठा रहे हैं, और दूसरी तरफ हैं अपने हाथों में पाकिस्तान का झंडा लिए इस भारत को तोडने की साजिश करते लोग । आप इसे पढकर ही समझ जायेंगें कि इसमें गलत कौन हैं लेकिन शायद हमारे देश की निपुंसक सरकार और पुलिस के लिए तो भारत माता की जयकार लगाने वाले ही देश द्रोही हैं जिन पर लगातार जम्मू में पुलिसिया अत्याचार किया जा रहा है।

क्या हमारे अपने देश में इस बात की भी इजाजत नहीं हैं कि अपने हितो के लिए आवाज उठाई जा सके? क्या हम अभी भी गुलामी के दौर में ही जी रहे हैं? आज जम्मू में चल रहे हालतो को देखकर तो .ये ही लगता है ।
जम्मू में बने हालात सिर्फ अमरनाथ को जमीन नहीं दिये जाने का ही मामला नही हैं ब्लकि ये जुडा है मुस्लिम तुष्टिकरण की उस नीति से जिसे आजादी के बाद से ही काग्रेस सरकारें अपनाती आ रही हैं। आज जम्मू के लोग इस हक के लिए सडको पर उतरे हैं जिससे उनहे सालों से महरुम किया गया हैं। सालों से घाटी को अपने वोट के लिए पालती पोसती सरकारें ही दोषी हैं आज की स्थिति के लिए। क्या कश्मीर इस भारत का हिस्सा नही हैं जहां पर एक हिन्दू तीर्थ के लिए जगह देनें में सरकार को पसीने छूट रहें हैं।

मामले को बिगाडने में कश्मीर घाटी के नेताओं का ही हाथ रहा है नही तो क्या कारण है कि जिस जमीन को सभी दलों ने मिलकर दिया था। उस पर चुनावो के पास आते ही पीडीपी और नेशनल काफ्रेस जैसी पार्टियों के छाती पर सांप लोटने लगे है। इस जमीन को सिर्फ कश्मीर का बताने वाले इन नेतोओ पर मुकदमा चलना चाहिए जो देश को तोडने वाली बयान बाजी महज बोटो के लिए कर रहे हैं।
उमर अबदुल्ला लोकसभा में दिये अपने भाषण के लिए पीठ ठोंक रहें हैं। सरे आम भारत की संसद में उन्होने कहा कि जमीन कश्मीर की है और हम इसे नहीं देगे। लेकिन किसी ने उनसे नहीं पूछी कि क्या कश्मीर भारत से अलग है? ये नेता कश्मीर के जातीय समीकरण बदलने की बात करते हैं इसका मतलब है उन लाखों कश्मीरी हिन्दूओ को वो बूल चुके हैं जिनहे कश्मीर से आतंकवाद के दौर निकाला गया था। इसका मतलब है कि उमर भी इनहे निकाले जाने का समर्थन दे रहे हैं। उमर लोकसभा मे खडे होकर चिल्लाने से सच्चाई नहीं बदल जाती है। उमर के पिता फारुक से कोई पूछे कि जिसे छोटी सी जमीन के लिए वो तडप रहे हैं वो उस गोल्फ मेदान से भी छोटी होगी जहां वे श्रीनगर में गोल्फ को शौक पूरा करने जाते हैं। अगर उन्हे इतना ही दुख है तो अपनी सरकार में मैदान दान करने का वादा क्यों नही करते कश्मीर की जनता से।
पता नहीं कश्मीर के भीगे पंडितो का कितना दुख हमारी सरकार को समझ आता है लेकिन मैं अपने बचपन का अनुभव बता सकता हूँ। मैं उस समय छठी में पढता था शायद १९८९ - १९९० की बात है कश्मीर में अतंकवाद जोरों पर था। हमारे क्लास में एक लडका आया जिसे से मेरा पहला परिचय इतना ही हुआ कि वो कश्मीरी है और पंडित हैं। वो लोग कश्मीर से भाग कर आये हैं। जब मेरी उसेस बात हुइ तो मैने उससे पीछा कि कश्मीर को बहुत खूबसूरत है बहां तो बर्फ पडती है। क्या तुमने देखी है तो उसके चेहरे पर जो दर्द उभरा था उसे में आज तक नहीं भूला । यही है कश्मीर की हकीकत जिसे देखने से कश्मीर ही नहीं केन्द्र के डरपोक नेता भी इंकार करते हैं। मै तो आशा करता हूँ कि जम्मू में चल रहा आन्दोलन हमारे नेताओ को सही दिशा में सोचने के लिए मजबूर करेगा नहीं तो जम्मू से निकली चिंगारी को पूरे देश में फैलते देर नहीं लगेगी।

Tuesday, August 5, 2008

चरैवेति-चरैवेतिः पहलगाम में...

तीसरे दिन दोपहर तक हम पहलगांव पहूँच गये। सभी लोग राफ्टिग करने के बाद गीले थे इसलिए सबसे पहले होटल ढूँढने की कवायद शुरु हुई। पहलगांव में बस अड्डे से आगे सीधे हाथ पर मुडते की काफी सारे होटल एक कतार में बने हैं। इनका खासियत ये है कि इन सबके सामने से खूबसूरत लिद्दर नदी बहती नजर आती है साथ ही खिडकी से नदी के पीछे खडे उँचे पहाडो के देखना अच्छा लगता है।

हमने भी यहीं पर कमरा लेने का कोशिश की लेकिन एक तो पर्यटन का मौसम और दूसरे अमरनाथ यात्रा के कारण किसी भी जगह पर हमको एक साथ आठ कमरे नहीं मिल पा रहे थे। थक हार कर हमने अलग अलग होटलो में ही कमरे लिए। हमें बजट के अंदर ही करीब १२०० रुपये में कमरा मिल गया।

मेरा कमरा तीसरी मंजिल पर था और वहां से सामने बहती नदी को देखकर मेरी तो सारी थकान उतर गई। उसके बाद मैने थकान उतारने के लिए कहवा मंगवाया। कहवा पीने के बाद थकान दूर हुई तब तक कपडे भी सूख गये थे। शाम के चार बज चुके थे और हम पहलगांव देखने कि लिए निकल पडे।

पहलगाव कश्मीर का बेहद ही सुन्दर और प्यारा हिल स्टेशन है। समुद्र तल से करीब २१०० मीटर की ऊँचाई पर लिद्दर नदी के किनारे बसा है पहलगांव। पहलगांव चारो ओर से बर्फ से ढके उँचे पहाडो से घिरा है। ये पहाड और नदी इसे अनोखा हिल स्टेशन बना देते हैं। यहां आस पास घूमने के लिए कई जगहे हैं जहां घोडे पर या पैदल जाया जा सकता है। लेकिन शाम होने की थी इसलिए हम कहीं दूर नहीं जा सकते थे तो हमने आस पास ही घूमने की सोची।

वैसे पहलगांव के इलाके में सुन्दर घाटियां और घास के मैदान हैं जिन्हें देखा जा सकता है। सबसे पहले हम पहुचे नदी के किनारे वहां जा कर जम कर फोटो खींचे। नदी के पानी में पैर डाल कर बैठे रहे लेकिन पहाडो पर ग्लेशियरो से बहकर आता पानी बहुत ही ठंडा था।

नदी के किनारे बैठे बैठे अंधेरा होने लगा तो हम वंहा से चल दिये बाजार की तरफ। छोटा सा बाजार है जहां से जरुरत की सारी चीजे खरीदी जा सकती हैं। बाजार में ज्यादा भीड भीड नहीं थी शांत सडक पर चहलकदमी करते हुए हमने पूरा बाजार देख लिया। बाजार की तरफ भी मुझे कई अच्छे होटल दिखाई दिये अगर आप का बजट ज्यादा है तो यहां रुका जा सकता है। बाजार से हमने भी कुछ जरुरी चीजे खरीदी जो हमारी आगे की अमरनाथ यात्रा के लिए चाहिये थी। मैने एक पिट्ठू बैग और दस्ताने खरीदे।

ये सब करते करते रात होने लगी थी। तो हम वापस होटल के लिए चल दिये। होटल पहुचने पर चाय पीने के लिए होटल के लान मे ही बैठ गये तभी मुझे बहां एक मालिश वाला दिखाई दिया। सारे दिन की भाग दौड के बाद पैरो में दर्द हो रहा था साथ ही अगले दिन अमरनाथ की यात्रा की शुरू करनी थी।

मै यात्रा पैदल ही पूरी करने की ठान कर आया था। इसलिए अगले दिन का ख्याल करके मैने मालिश करवा ही ली जिससे थके पैरों को कुछ तो आराम मिल सके। मालिश के दौरान ही मालिश वाले ने बताया कि ये उसका पुश्तैनी काम है और हर साल पर्यटम के मौसम में वो यहां आ जाता है। मालिश बडी ही जोरदार निकली हाथ पैरो का सारा दर्द निकल गया। मैं अब अगले दिन के लिए बिल्कुल तैयार था। रात को काफी देर तक मैं लान मैं बैठ कर ठंडे मौसम का मजा लेता रहा। करीब दस बजे खाना खाकर मैने सोने के लिए चला ही गया अगले दिन सुबह जल्दी जो उठना था।

अगली कडी में भगवान भोलेनाथ की अमरनाथ यात्रा..........

मुसाफिर की सफाई

पिछला पोस्ट बिना टेक्स्ट के चला गया, गुनहगार -सा महसूस कर रहा हूं। लेकिन सच तो ये है कि तकनीकी नॉलेज में लिद्दड़ होना और ऐन वक्त पर अभिकलित्र यानी कंप्यूटर के धोखे की वजह से ऐसा हुआ। फिर अपने एक भाई की मदद से तस्वीरें लोड करनी चाहीं तो पोस्ट पब्लिश हो गईँ।

Monday, August 4, 2008

पहलगांव से पहाडों का नजारा











पहलगांव बाजार और लिद्दर नदी