Sunday, July 27, 2008

श्रीनगर की यात्रा (६)- श्रीनगर से पहलगांव का सफर

तीसरा दिन-
तीसरे दिन हम चल पडे कश्मीर के खूबसूरत हिल स्टेशन पहलगाव देखने के लिए। पहलगाव जाने के एक कारण ये था कि हमें आगे अमरनाथ की चढाई करनी थी और पहलगाव अमरनाथ यात्रा का पहला स्थान है जहां ये यात्रा शुरु की जाती है। श्रीनगर से पहलगाव के रास्ते में भी देखने के लिए काफी कुछ है इसलिए हमने सुबह सवेरे ही पहलगाव के लिए निकलने तय किया जिससे रास्ते का भी पूरा मजा लिया जा सके। लगभग आठ बजे हम निकल पडे अपने सफर पर। सुबह का समय था श्रीनगर की सडके अभी खाली थी सुबह के उन्नीदे पन में ही हम शहर से बाहर आ गये ।
जैसे ही बाहर आते हैं एक बार फिर से कश्मीर का असली सौन्दर्य दिखाई देने लगता है। सडके के दोनों और फैले खेत, सडके किनारे नहरों में कलकल बहता मीठा पानी जिसे देखते ही मन डुबकी लगाने के लिए मचलने लगता है। इन खेतों में काम करते महनत कश लोगों को देखना अलग ही अनुभव है।


थोडा आगे चलते ही हमें केसर के खेत दिखाई दिये गाइड ने बताया कि अभी तो ये खाली हैं क्योकि अभी केसर उगाने का मौसम नहीं है लेकिन कुछ महीने के बाद इनमें केसर लहलहाने लगेगी। इन्ही खेतों के किनारे छोटी छोटी दुकाने हैं जहां से असली केसर खरीदी जा सकती है।
अब तक हमें निकले एक घंटा हो चुका था और सबको भूख लगने लगी था इसलिए नाश्ते के लिए रास्ते में था। हमने अपना नाश्ता रास्ते के वैष्णो ढाबे पर किया। ये ढाबा देखकर थोडा ताजुब्ब भी हुआ क्योकि श्रीनगर के बाहर वैष्णों ढाबे अब दिखाई नहीं देते। शर्मा जी के इस ढाबे पर हमने गरमागरम पराठों और राजमे का आन्नद लिया । राजमा बहुत ही अच्छा था वैसे भी कश्मीर का राजमा बेहद अच्छा माना जाता है।

बैट बनाने का काऱखाना।



कश्मीर में पाये जाने वाली विलो पेड की लकडी बैट बनाने के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है। यहां भी विलो और अखरोट की लकडी से बैट बनाये जा रहे थे। ये तकनीक के लिहाज से तो अच्छे नहीं थे लेकिन कश्मीर की याद के तौर पर जरुर खरीदा जा सकता है। कारखाना देखने के बाद मैने भी पास की दुकान के एक बैट खरीद ही लिया। रास्ते में भी सडके के दोनो और बैट की लकडी सूखती दिखाई दे रही थी।







ढाबे से करीब दस किलोमीटर दूर था अवन्तिपुर, जहां नौ वी शताब्दी में बने अवन्तिपुर शहर के अवशेष देखे जा सकते हैं। अवन्तिरपुर श्रीनगर से करीब तीस किलोमीटर दूर है। अवन्तिपुर को राजा अवन्तिपुर ने नौ वीं शताब्दी में बसाया था। अब शहर के अवशेष तो नहीं हैं लेकिन उस समय के दो मन्दिर जिसमें एक शिव मन्दिर और है दूसरा विष्णु मन्दिर है के अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं ।









भगवान विष्णु का मन्दिर पहलगाव जाने सडक किनारे पर है जिसे पुरात्तव विभाग ने संरक्षित कर रखा है। मन्दिर का परिसर बडा ही विशाल है मुख्य द्वार तो देखते ही बनता है उस पर बडी ही कुशलता से मुर्तियां उकेरी गयी है। मुख्य द्वार के सामने है मन्दिर का गर्भ गृह जिस तक पहुचने के लिए साढियां चढनी पडती हैं। उपर बस एक चबूतरा ही बचा है जिस में कभी भगवान विष्णु की भव्य प्रतिमा हुआ करती थी। मुख्य मन्दिर के चारो ओर कम उचाई के चार चबूतरे बने हैं जिन पर चार देवताओ के मन्दिर हुआ करते थे।













इसके बाद मन्दिर के चारो और की दीबार पर ६९ छोटे मन्दिर बने थे। जिसे देख कर उस समय की भव्यता का अनुमान आसानी के लगाया जा सकता है। मन्दिर को बनाने के लिए स्थानिय पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। मुझे तो देख कर ताजुब्ब हो रहा था कि उस जमाने में इतने विशाल पत्थरो को कैसे यहां तक लाया गया होगा।










वहां के गाईड ने तो एक बडी ही आश्चर्य जनक बात बताई की इन पत्थरो को जोडने के लिए किसी भी तरह के बाईन्डिग मैटेरियल का इस्तेमाल नहीं किया है। पत्थरो को आपस में जोडने के लिए अनोखी विधी का प्रयोग किया गया जैसा कि आप फोटो में देख रहे हैं एक पत्थर में छेद बनाया जाता था दूसरे में नुकीला हिस्सा जिन्हे आपस में एक दूसरे पर बिठा दिया जाता था। भारी वजन से ये आपसे में जुडे रहते थे। बाद में ये मन्दिर झेलम नदी में आयी एक बाढ में खत्म हो गया था।











भारत की प्राचीन विरासत को देखने के बाद हम आगे बढे। रास्ते के सुन्दर नजारे हमारे सफऱ को शानदार बना रहे थे। अभी तक हम घाटी के मैदानी इलाके में थे लेकिन अब पहाडी रास्ता शुरु हो चुका था। अब हमारे सफर में साथ थी पहलगाव से आती लिद्दर नदी। एक ओर बहती नदी तो दूसरी और ऊँचे पहाड मन मोह रहे थे। तभी मुझे लिद्दर नदी में चलते राफ्ट दिखाई दिये गाईड ने बताया कि पास में ही राफ्टिग करवाई जाती है। मेरा तो मन मचल पडी करने के लिए पिछली बार जब श्रीनगर ( गढवाल) गया था तो ऱाफ्टिग नहीं कर पाया था पर तबसे ही मन में हसरत थी जो आज मुझे पूरी होती लगी।












अखिरकार हम ने भी अपना गाडी रोकी और ऱाफ्टिग करने के चल पडे। हमें सेफ्टी जैकेट और हैलमेट पहनाये गये साथ ही इन्सट्रकटर नें जरुरी हिदायते हमें बताई। इसके बाद हम उतर गये नदी के तेज पानी में बहने के लिए। राफ्ट मे बैठने से पहले तो थोडा डर लग रहा था लेकिन बैठने के बाद वो भी दूर हो गया। मै तो सबसे आगे ही बैठा था जैसे ही हमारी ऱाफ्ट तेज लहर से टकराती थी ठंडा पानी मेरे ही उपर होता था।
हालांकि हमने तीन चार किलोमीटर ही राफ्टिग की लेकिन जिस रोमाच का अनुभव मैने किया उसे शब्दों में बताया ही नहीं जा सकता। जब हम नीचे उतरे तो सारे कपडे भीग चुके थे। मै तो ठंड से कांप रहा था लेकिन जिस रोमाच को मैने महसूस किया उसके सामने ये परेशानी कुछ भी नहीं थी।




खैर मजा लेकर हम आगे बढे पहलगाव के लिए थोडी ही देर में देवदार के जंगल दिखाई देने लगे। गाईड ने बताया कि पहलगाव आने ही वाला है। देवदार और चीड के घने जंगलो के बीच से निकल कर हम आगे चलते जा रहे थे। रास्ते की खूबसूरती बता रही थी कि हम वाकई किसी जन्नत में जा रहे हैं। आखिरकार हम पहलगाव पहुच ही गये। पहलगाव की खूबसूरती अगली बार.............................................

Sunday, July 20, 2008

श्रीनगर की यात्रा (५)

दुसरे दिन मुगल बगीचे देखने के बाद हमने ऱुख किया विश्व प्रसिद्ध हजरतबल दरगाह की तरफ। ये एक खूबसूरत मस्जिद है जो डल झील के किनारे बनी है। डल इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती है। इस मस्जिद में हजरत मोहम्मद की दाढी का बाल रखा गया है इसलिए इसके बेहद पवित्र माना जाता है। साल में एक बार इस बाल के दर्शन आम जनता को करवाये जाते है।


पूरी इमारत सफेद संगमरमर से बनी है। अन्दर मुख्य हाल में लकडी का सुन्दर काम किया गया है। अन्दर फोटो लेना मना था इसलिए आपको दिखा नही सकता।

मस्जिद का पूरबी छोर डल झील की तरफ है। इस ओर से देखने पर मस्जिद की विशालता नजर आती है। यहां से शिकारा लेकर चार चिनार देखने के लिए जाया जा सकता है।



यहां से बाहर निकलते ही सामने श्रीनगर विश्वविद्यालय नजर आता है। काफी बडे इलाके में इसको बनाया गया है। यहां खाने पीने की भी दुकाने है। आगे बढने पर हमने नागिन झील देखी। ये झील डल की तुलना में काफी छोटी है लेकिन शहर की भीड भाड से दुर होने के काऱण काफी शान्ती है यहां। इस झील में भी हाउस बोट हैं जिनमें ऱुका जा सकता है। नागिन झील के बाद हमारा अगला मुकाम था ऱोजाबल। ये एक दरगाह है जिसके बारे में माना जाता है कि ये कब्र ईसा मसीह की है।ऐसा विश्वास किया जाता है कि ईसा मसीह ने अपने आखिरी दिन यही बिताये थे। ये जगह एक तंग गली में हैं। इसे श्रीनगर की देखने वाली जगहो में शामिल नहीं किया जाता है इसलिए अगर आप इसे देखना चाहते हैं तो अपको अपने गाडी वाले से कहना होगा। ये जगह खानयार इलाके में हैं ।




ये सब देखते हुए शाम के पांच बज चुके थे। सबसे आखिर में हम लोग लाल चौक गये। लाल चौक श्रीनगर का सबसे बडा बाजार है। लेकिन इसके साथ ही ये जगह अब राजनीति का भी केन्द्र है । श्रीनगर में होने वाली राजनैतिक रैलियां यहीं आयोजित की जाती हैं। सुरक्षा भी बेहद पुख्ता इंतजाम यहां किया गया है। इससे ही लगा है रेजिडेन्सी रोड का इलाका। ये भी एक बाजार है जहा से कश्मीरी चीजों की खरीदारी की जा सकती है।


ये सब देखते हुए रात कब हो गयी पता ही नहीं चला । हम लोग वापसे लौट गये अपने होटल के लिए और इस तरह हमारा श्रीनगर का तीसरा दिन खत्म हुआ।अगले दिन पहलगांव की यात्रा लेकिन वो अगले अंक में.............................

Sunday, July 13, 2008

श्रीनगर की यात्रा (४)- शंकराचार्य मंदिर और मुगल बगीचे

दूसरा दिन-
श्रीनगर में दूसरे दिन हमारा सफर शूरू हुआ शंकराचार्य मंदिर के दर्शन के साथ। ये मंदिर डल के पास एक पहाड जिसे तख्त-ए-सुलेमानी कहा जाता है पर बना है। शिव का ये मंदिर करीब दो हजार साल पुराना है। जगदगुरु शंकराचार्य अपनी भारत यात्रा के दौरान यहां आये थे। उनका साधना स्थल आज भी यहां बना हुआ है। मंदिर का फोटो लेने की अनुमति नहीं है। लेकिन ऊँचाई पर होन के कारण यहां ये से श्रीनगर और डल का बेहद खूबसूरत नजारा दिखाई देता है। मंदिर के नीचे तक जाने के लिए सडक बनी है फिर भी करीब दो सौ सीढियां तो आपको चढनी ही पडती हैं।

परी महल -
मंदिर के दर्शन के बाद हमने शुरु किया संसार भर में प्रसिद्ध मुगल बागीचों का सफर। इसमें पहली कडी था परी महल जिसको शाहजहां के बेटे दाराशिकोह ने बनवाया था। कहा जाता है कि पहले ये एक बौद्ध मठ था जिसे दाराशिकोह ने वेधशाला में बदलवा दिया था। यहां का बगीचा बेहद खूबसूरत है और ऊँचाई के कारण झील का विहंगम रुप यहां से देखा जा सकता है।



चश्म-ए-शाही-

परी महल के ही नजदीक है चश्म-ए-शाही का बागीचा। इस बागीचे को शाहजहां ने १६३२ में बनवाया था। मुगल स्थापत्य का बेजोड नमूना है चश्म-ए-शाही। मुगल बागीचो के शौकीन थे इसलिए हर जगह उन्होने शानदार बागीचे बनवाये थे। मुगल बागीचो की खासियत होता था उनका एक के बाद एक छत बनाकर उँचाई की आर बढते जाना, साथ ही बगीचों में बहते पानी की नहरे, फव्वारे भी लगाये जाते थे। कमोबेश यही रुप आप आज भी यहां आकर देख सकते हैं। मुगल बागीचों को फूलों के पौधो ओर पेडो से सजाया जाता था। चश्म-ए-शाही को मुगलिया सुन्दरता को आज भी यहां आकर महसूस किया जा सकता है।




इस बागीचे की एक और खासियत यहां बहने वाला झरना हैं। इसके पानी को सेहतमंद माना जाता है। मैने जब इसे पीकर देखा तो पता चला कि वाकई पानी का स्वाद बेहतरीन है। कहा जाता है कि भारते के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु इसी चश्मे का पानी पिया करते थे।







निशात बाग-









इसेक बाद हम पहूँचे निशात बाग देखने कि लिए। ठीक डल के सामने बना है ये बागीचा। इसमें जाते समय में सोच रहा था कि आज तक जिस निशात के बारे में सिर्फ किताबों में ही पढा है क्या उसे मैं सचमुच देख पा रहा हूँ। वाकई ये इतना सुन्दर है कि अन्दर जाते ही मै तो सब कुछ भूल कर कभी बागीचे तो कभी उसके सामने पसरी पडी झील को ही निहारता रहा। यहां आकर उस बात का मतलब समझ आता है जिसमें कश्मीर को जन्नत बताया गया है। ये बागीचा सभी मुगल बागीचों में सबसे बडा है। इसके पीछे पहाड पसरे पडे हैं तो सामने है डल झील। इसको १६३३ में शाहजहा ने ही बनवाया था।





शालीमार बाग-








शालीमार को मुगल बादशाह जहांगीर ने बनवाया था। मुगल कलाकारी की पूरी झलक इसमें भी देखने को मिलती है। इसकी खासियत है इसके बीच बनी चौडी नहरे जिनको रंगबिरगें पत्थरो से सजाया गया था, साथ ही नहरो के बीच बने छोटे ताल जिनमें बैठने के लिए बारादरी बनवाई गयी है।

इस तरह हमारा श्रीनगर के मुगल बागीचो का सफर तो पूरा हुआ लेकिन दुसरे दिन का हमारा सफर अभी बाकी है जिसके चर्चा अगली बार.........................................

Thursday, July 10, 2008

श्रीनगर की यात्रा (३) - डल के तैरते खेत

डल की एक खासियत है इसमें तैरते खेत। ये खेत जमीन पर मिलने वाले खेतों के जैसे ही होते हैं। जरुरत की सभी सब्जियां इसमें उगाई जाती है। देख कर आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं कि ये खेत वास्तव नें स्थिर ना होकर झील की सतह पर तैर सकते हैं। इन्हे देख कर तो मैं हैरत में पड गया था। ये तैरते खेत इस बात की मिसाल है कि आदमी अपने आस पास के वातावरण को किस हद तक अपने अनुरुप ढाल सकता है।









डल में वाटर लिली का पौधा बहुतायात में होता है। और इन तैरते खेतों को बनाने में भी इसी पौधे का इस्तेमाल किया जाता है। वाटर लिली के तने पानी पर तैरते रहते हैं इन्ही तनों को आपस में बांधकर एक सतह तैयार की जाती है जो कि पानी पर तैर सकती है। इसको झील के पानी में कुछ समय के लिए छोड दिया जाता है। शायद मिट्टी की हल्की परत भी बिछाई जाती है। इसके बाद मनचाहे फसल के बीज डाल दिये जाते हैं। थोडे ही दिनों में लहलहाती फसल दिखाई देने लगती है। मैने लोकी की अच्छी फसल इन खेतों में देखी।इन खेतों को शिकारे के पीछे बांध कर मनचाही जगह ले जाया जा सकता है।

Wednesday, July 9, 2008

मेरी श्रीनगर यात्रा (२) - डल झील का सफर

पहला दिन डल का सफर
पहले दिन हम निकल पडे शिकारे से डल झील के सफर पर। जहां से आप शिकारा लेते हैं यानि बिलवर्ड रोड । वहां पर झील एक नहर के रुप में हैं इसलिए डल की असली रुप को आप समझ ही नहीं पाते हैं। लेकिन थोडी ही देर में आप खुली झील में पहुचते और दिखाई देता हैं डल झील का असीम विस्तार दूर दूर तक पानी ही पानी दिखाई देता है।

डल का विस्तार इतना ज्यादा है कि एक बार में आप उसे पूरा देख ही नहीं सकते हैं। खुली डल में ही झील की असली खूबसूरती नजर आती है फैला पानी ऐसा आभास देता है कि छोटे से समुद्र में आ सैर कर रहें हो। आस पास चलते शिकारे , हाउस बोट एक अलग ही संसार आप को नजर आने लगता है।










शिकारे वाला हमें सबसे पहले नेहरु पार्क में ले गया ये पार्क डल झील के बीच एक टापू पर बनाया गया है। इस जगह से डल के चारों और के नजारे देखें जा सकते हैं। मौसम भी बेहद सुहावना हो रहा था हल्की हल्की बूँदाबांदी भी हो रही थी। ऐसे मौसम में पार्क में खडे होकर सामने के ऊँचे पहाडों पर छाते जा रहे बादलों को देखना अनोखा अनुभव है।








पार्क में बाहर से आये पर्यटक ही नहीं बल्कि श्रीनगर के स्थानिय लोगों का भी जमावडा लगा हुआ था। बडी संख्या में युवक वहा मौज मस्ती कर रहे थे। मैने पुछा तो पता चला कि उस दिन रविवार था और रविवार को यहां के बाशिंदे भी नेहरु पार्क में आते हैं। वहां खडे होकर मैं तो डल को ही निहारता रहा वहा से जाने का मन ही नहीं कर रहा था। लेकिन शिकारे वाले ने कहा की आगे आप को डल मे बसी दुनिया दिखायेगें। जहां पूरा शहर ही झील में बसा पडा है।





हम अब नेहरु पार्क से आगे चल पडे। थोडा आगे जाने पर डल मे सजी दुकाने नजर आने लगी। जरुरत का हर सामान वहां मिल रहा था। इन दुकानो को झील में ही बनाया गया था। दुकानों से झील में रहने वाले लोग सामान खरीदते हैं। वहीं कश्मीर के हस्त शिल्प का सामान भी मिल रहा था जहां से पर्यटक भी खरीदारी करते हैं। झील के बीच में गलियां बनी थी जिनमें चलता शिकारा हमें वेनिस में चलने का आभास दे रहा था।







झील में ही शिकारा बनाने का कारखाना, लकडी के सामान बनाने का कारखाना सब कुछ आप देख सकते हैं। यहां से आप अखरोट की लकडी का बना खूबसूरत सामान खरीद सकते हैं। वहीं आप को सामान बनाता हुआ कारीगर भी दिखाई दे जायेगा।











सिर्फ ये ही नही झील में स्कूल से लेकर अस्पताल तक सब कुछ बना है। छोटी छोटी नावों मे बैठकर स्कुल जाते बच्चो को देखकर आप ताजुब्ब में पड जायेंगें। मैं झील की इस दुनिया की बात कर रहा था । झील की सैर करते हुए आप कुछ खाना पीना चाहे तो वो भी यहां मिल जायेगा। शिकारे पर कोल्ड ड्रिक्स, चिप्स , बिस्कुट चाय बेचते लोग मिल जायेगें। शिकारे पर लगी ये छोटी छोटी तैरती दुकाने मन मोह लेती है।







ये था झील की दुनिया का सफर ...................................

Friday, July 4, 2008

मेरी श्रीनगर यात्रा (१)

पहला दिन
एक हफ्ते पहले से मन दिल्ली में नहीं लग रहा था। चाह रहा थी कि अभी उड कर कश्मीर की वादियों में चला जाउँ। धरती के स्वर्ग को देखने के लिए इच्छा बढती ही जा रही थी। आखिर कार चौदह की रात आ गई पूरी रात ही जैसे आंखों ही आंखो में कटी। पन्द्रह की सुबह मैं दिल्ली हवाई अड्डे पर था। कश्मीर को देखने की इच्छा इतनी ज्यादा थी कि हवाई जहाज में खिडकी की सीट ली ताकि पहला नजारा उपर से ही देख सकूँ। लगभग नौ बजे उडान शुरू हुई और दस बजे पायलेट नें बताया कि हम बस उतरने ही वाले हैं। उपर से ही सुन्दरता दिखाई देने लगी थी।




आसमान से ही नजारे अपने कैमरे में लेकर हम श्रीनगर की धरती पर उतरे।




श्रीनगर एक घाटी में बसा है इसलिए एकदम से एहसास नहीं होता कि किसी हिल स्टेशन में आ गये है। किसी मैदानी शहर जैसा ही लग रहा था श्रीनगर का पहला ऱुप। एयरपोर्ट शहर से पन्द्रह बीस किलोमीटर दूर है इसलिए टैक्सी लेकर हम शहर की तरफ चल दिये। वहा भी प्री पेड की सुविधा है। हवाई अड्डे पर ही पर्यटक सूचना केन्द्र है वहां से सारी जानकारी ली जा सकती है। वही से पता चला कि डल झील से सामने ही बिलवर्ड रोड है जहां पर बडा संख्या में होटल हैं ।

बिलवर्ड रोड को श्रीनगर का पर्यटन केन्द्र कह सकते हैं। ये सडक डल झील के समानान्तर बनी है जिसके एक और डल तो दूसरी और होटल बने हैं। हम भी यहां पहुचे और होटल का पता किया इस रोड पर होटल थोडे मंहगे हैं कमरे दो हजार से पांच हजार के बीच मिल जाते हैं। हमने रहने के लिए गगरी बल का इलाका चुना ये बिलवर्ड रोड के ठीक पीछे की इलाका है औऱ थोडा सस्ता भी है। यहां भी बडा संख्या में होटल हैं एक हजार रुपये में अच्छा कमरा मिल जाता है। यहीं हमने होटल लिया। होटल साफ सुथरा था किसी तरह की कमी नहीं थी। कुछ आराम करने के बाद खाना खाकर हम लोग घूमने के लिए निकले।


श्रीनगर आने पर सबसे पहले हर कोई डल झील को ही देखना चाहता है। हम भी सबसे पहले डल के किनारे ही पहुँचे। जब झील को पहली बार देखा को देखता ही रह गया। विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अब तक जिस डल के बारे में पढा भर था या दूसरों से सुना था आज मैं इसके सामने खडा हूँ। डल में तैरते रंग बिरंगे शिकारे अलग ही छटा बिखेर रहे थे। सडक पर थोडी थोडी दूर पर शिकारो के खडे होने की जगह बनी है जहां से शिकारे लिए जा सकते हैं। शिकारे वाले से चार सौ रुपये से बात शुरु हुई और आखिर में ढाई सौ रुपये में ले चलने पर बात तय हो गई। करीब तीन घंटे का ये सफर आपको एक दुसरी ही दुनिया की सैर कराता है









ये दुनिया है जो डल में बसी है जिसमें झील में बसे बाजार हैं, घर हैं दुकाने हैं स्कूल और अस्पताल हैं। तैरते खेत हैं तो नाव बनाने के कारखाने भी हैं। यानि वो सब कुछ जो एक शहर में होता है आपके डल में मिल सकता है। झील की दुनिया का सफर अगले अंक में।.............................................

Wednesday, July 2, 2008

मेरी श्रीनगर और अमरनाथ यात्रा

काफी दिनों से ब्लाग की दुनिया से दूर था। अभी दस दिन की कश्मीर और बाबा अमरनाथ की यात्रा से वापस आया हूँ। कश्मीर के अपने सारे अनुभव जल्द ही आप सब के साथ बाटूँगा। कश्मीर तो वाकई जन्नत है आज तक मैने इससे खूबसूरत जगह अपनी जिंदगी मे नहीं देखी। जिसे किसी ने भी इसे जन्नत बताया था शायद कम कहा था ये तो जन्नत से भी ज्यादा खूबसूरत है। अभी श्रीनगर में डल झील के कुछ नजारे देखिये।