
आज चलते हैं उत्तरांचल के ऐतिहासिक शहर काशीपुर के सफ़ऱ पर। काशीपुर उत्तरांचल के तराई इलाके में बसा छोटा सा खूबसूरत शहर है। इस शहर का इतिहास हर्षवर्धन ( ६०६-६४७) से लेकर महाभारत काल तक जाता है। हर्ष के समय के पुरास्थल अभी भी यहा देखे जा सकते है।
पुराणों में इसको उज्जनक नाम से लिखा गया है। हर्ष के समय काशीपुर को गोविषाण के नाम से जाना जाता था। चीनी यात्री ह्वेन सांग (६३१-६४१) ने भी काशीपुर की यात्रा की थी। मेरा ननिहाल भी काशीपुर का ही है इसलिए पिछले दिनो यहां जाना हुआ। सोचा की यहां से आप सबका भी परिचय करवा दिया जाए।
काशीपुर के इतिहास को खोजने के लिए यहां सबसे पहले १९५२ में खुदाई की गई। उसके बाद १९७०-७२ और सबसे आखिर में २००२-०३ में यहां खुदाई की गई। यहां हुई खुदाई में हर्ष के समय के मंदिर और शहर के अवशेष मिले हैं।आज के शहर से लगभग दो किलोमीटर दूर पुरानी बसावट मिली है। यहां मिले मिट्टी के बर्तनो, सिक्को, इमारतों की बनावट से ये पता चलता है कि शहर महाभारत काल से ही अस्तित्व में है।

अभी जो फोटो आप देख रहें हैं वो वहां मिले मंदिर के हैं जो कि हर्ष के समय का है। इस को पक्की ईंटो से बनया गया है। बाहरी दीवारो पर लगी ईटो की चमक आज पन्द्रह सौ साल बाद भी बरकरार है।


पुराणों में इसको उज्जनक नाम से लिखा गया है। हर्ष के समय काशीपुर को गोविषाण के नाम से जाना जाता था। चीनी यात्री ह्वेन सांग (६३१-६४१) ने भी काशीपुर की यात्रा की थी। मेरा ननिहाल भी काशीपुर का ही है इसलिए पिछले दिनो यहां जाना हुआ। सोचा की यहां से आप सबका भी परिचय करवा दिया जाए।
काशीपुर के इतिहास को खोजने के लिए यहां सबसे पहले १९५२ में खुदाई की गई। उसके बाद १९७०-७२ और सबसे आखिर में २००२-०३ में यहां खुदाई की गई। यहां हुई खुदाई में हर्ष के समय के मंदिर और शहर के अवशेष मिले हैं।आज के शहर से लगभग दो किलोमीटर दूर पुरानी बसावट मिली है। यहां मिले मिट्टी के बर्तनो, सिक्को, इमारतों की बनावट से ये पता चलता है कि शहर महाभारत काल से ही अस्तित्व में है।

अभी जो फोटो आप देख रहें हैं वो वहां मिले मंदिर के हैं जो कि हर्ष के समय का है। इस को पक्की ईंटो से बनया गया है। बाहरी दीवारो पर लगी ईटो की चमक आज पन्द्रह सौ साल बाद भी बरकरार है।



ये इलाका लगभग छ सौ एकड में फैला हुआ है। यहा आज भी पूरा शहर दबा पडा है। पुरे इलाके में उस जमाने की ईटें बिखरी पडी हैं। आप को एहसास होगा कि जैसे सदियों पुराना इतिहास आप के साथ चल रहा है


गिरीताल-

इस के पास ही द्रोणासागर ये एक झील है और उसके चारों मंदिर बने हैं। ये बेहद खूबसूरत जगह है सुबह सुबह यहां टहलने का मजा ही कुछ और है। द्रोणसागर का सम्बन्ध पाडवों के गुरु द्रोण से बताया जाता है। कहा जाता है कि ये गुरु द्रोण का आश्रम था । इसमें सच्चाई भी लगती है क्योकि यहां से महाभीरत कालीन अवशेष मिले हैं।
द्रोणसागर में ही भारतीय पुरातत्व विभाग का संग्राहलय भी है जिसमें काशीपुर की खुदाई से मिली चीजो को रखा गया है। यहा से काशीपुर के इतिहास की जानकारी ली जा सकती है।

भीमशंकर महादेव काशीपुर में भगवान शिव का प्रसिद्ध मंदिर और तीर्थ स्थान है। यहां का शिवलिंग काफी मोटा है जिसके कारण इन्हे मोटेश्वर महादेव भी कहा जाता है। पुराणो में भी इसका वर्णन मिलता है। आसाम में शिव के द्वाद्श ज्योर्तिलिगों में एक भीमशंकर महादेव का मंदिर है। काशीपुर के मंदिर का उन्हीं का रुप बताया जाता है।
चैतीमंदिर-
मोटेश्वर महादेव के पास ही है माता बालसुंदरी का मंदिर है जिसे चैती माता भी कहा जाता है। इस मंदिर की पूरे उत्तरांचल में बेहद मान्यता है।
गिरीताल-
ये भी एक झील है। यहां पर चामुंडा देवी का मंदिर है । पेडों से घिरी बेहद मनोरम जगह है गिरीताल। यहां झील में बोटिंग करने का अलग ही मजा है।
अभी पर्यटन मानचित्र पर काशीपुर को सही तरह से नहीं लाया गया है। लेकिन यहां देखने के किए इतना कुछ है कि अगर सही तरीके से बताया जाए तो बडी संख्या में पर्यटक यहां आ सकते हैं। खासतौर पर इतिहास मे रुचि रखने वाले पर्यटक यहां जरुर आना चाहेगें।
काशीपुर साल के किसी भी समय घूमने के लिए आया जा सकता है। जिम कार्बेट नेशनल पार्क यहां से साठ किलोमीटर की दूरी पर है इसलिए उसके साथ यहां भी आया जा सकता है। ये दिल्ली से जिम कार्बेट जाने वाले रास्ते पर ही है। प्रसिद्ध हिल स्टेशन नैनीताल यहां से लगभग अस्सी किलोमीटर है। तो नैनीताल आते समय काशीपुर आसानी से आया जा सकता है ।
कहां ठहरें-
गिरीताल में कुमाउं मंडल विकास निगम का गेस्ट हाउस है। इसके अलावा शहर के बस अड्डे के पास कई अच्छे होटल है। अभी चैती मंदिर जाने वाले रास्ते पर नया होटल द मेनर खुला है। लेकिन ये छोडा मंहगा है।
कैसे पहुचें-
दिल्ली से लगभग सवा दो सौ किलोमीटर दूर है। दिल्ली से आने के लिए रेल और बस सुविधा आसानी मिल जाती है।दिल्ली से एक ही रेल है लेकिन बस सुविधा हर समय मिल जाती है।










