
ये फोटो जो दिखाई दे रही है उसमें शायद कुछ भी खास ना दिखाई दे। पुलिस और लोगों के बीच खींच तान के दृश्य तो आम हैं इस देश के लिए।
इसमें खास ये है कि ये आरक्षण को लेकर सरकार की मनमानी के खिलाफ उठी आवाज है। जिसे दबाया जा रहा है। फोटोमें दिखाई दे रहा शख्स भी कोई साधारण लडका नहीं कि जिसे किसी राजनैतिक पार्टी ने बहला फुसला कर सरकार का विरोध करने के लिए मना लिया हो। या फिर पैसा देकर लाया गया हो जैसी पैसे से खरीदी भीड कई बार दस जनपथ पर पिछले दिनों दिखाई दी थी।
इस बार का बजट तो याद ही होगा जब बजट की घोषणा संसद में होते ही किसानो की भीड दस जनपथ पर उमड आई थी। लग रहा था कि जैसे देश का किसान को पता ही था सरकार क्या करने वाली है।
मैं फिर से आज के मुद्दे पर ही आता हूँ। फोटो में दिखाई दे रहा शख्स देश के सबसे अच्छे अस्पताल और मेडिकल कालेज अखिल भारतीय आर्युविग्यान संस्थआन यानि एम्स में पढने वाला डाक्टर है।
एम्स की प्रवेश परीक्षा में देश भर के बच्चे बैठते हैं जिसके बाद पचास को इस जगह पढने के लिए चुना जाता है। यानि यहां आने वाला देश के सबसे बेहतर में से एक होता है।
इतने मुश्किलों से यहां आने के बाद इनको क्या हुआ कि ये पुलिस के डंडे खाने, सरकार का विरोध करने के लिए सडको पर उतर पडे? चाहते तो आराम से पढकर बेहतर भविष्य के सपने बुन सकते थे। लेकिन इन्होने इसकी जगह सरकार की उस नीति का विऱोध करने की ठानी जिसकी आग में करीब अठारह साल पहले देश का भविष्य जल उठा था।
आज फिर लगभग वही स्थिति बन चुकी है जब सरकार केन्द्रीय उच्च शिक्षण संस्थाओं में ओबीसी के लिए आरक्षण देने की नीति वोट बैक की खातिर बनाने जा रही
सुप्रीम कोर्ट में आया तो अदालत ने भी सरकार के पक्ष में फैसला सुना दिया। लगा कि अब सारे विरोध शांत हो जायेगे। लेकिन फैसला भी घूमा फिरा कर आया जिसके कारण आज तक भ्रम की स्थिति बनी हुई है। आरक्षण तो अब लागू हो ही जाएगा लेकिन पोस्ट ग्रेजुएट में इसे लागू ना किया जाए या नहीं इस पर मतभेद हैं।
एम्स और दूसरे मेडिकल कालजो के छात्र इसका ही विरोध करने के लिए अदालत में धरने पर आये। जिस देश में सरकार मनमानी के अलावा कुछ ना करती हो वहां शायद आखिरी उम्मीद अदालत ही हैं। लेकिन यहां भी उनकी आवाज को सुनने की जगह पुलिस बल से दबाने की कोशिश की गई।
ये तो यहां आखों पर पट्टी बाध कर बैठी न्याय की देवी को बताने के लिए आये थे कि सरकार आप की भी नहीं सुन रही लेकिन उनकी आवाज को उठने ही नहीं दिया गया।
पचास या सौ कि संख्या में आये छात्रों को बडी संख्या में आये पुलिस वालों ने भर भर कर गाडियों में डाला जैसे कि किसी अपराधी से निपटा जा रहा हो। उनको घसीटा गया, थप्पड मारे गये। लोकतंत्र के लिए शर्म का दिन जहां लोगों को बात रखने की आजादी भी नहीं दी जा रही है।
मैं ये सब इसलिए लिख पा रहा हूँ कि सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को हुए इस विरोध को बतौर पत्रकार मैने भी देखा था । कुछ लोगों ने लिखा भी कि ये लोग अपने स्वार्थ के कारण विरोध कर रहे हैं क्योकि इनहें भी आगे पोस्ट ग्रेजूएट में जाना है। इस दुनिया में बिना स्वार्थ के तो कुछ भी नहीं होता ऐसे में स्वार्थ मान भी लिया जाया तो क्या इससे उनके विरोध के अधिकार को छीना जा सकता है।
भारत जैसे देश मे जहां पाच छ सौ लोग संसद में बैठकर देश की किस्मत को फैसला करते हो वहा ये हो सकता है और हो भी रहा है। मुझे एक और बात आजकल दिखाई दे रही है कि पिछडो के हितो की बात करना आज कल बुद्धिजीवी होने की पहचान बन गया है। भले ही उससे पिछडो का हित हो रहा हो या नहीं।
आरक्षण की बैसाखी थमा कर किसी का भला किया जा सकता है ये मेरे समझ से बाहर है। जो एक बार ग्रजुएट में आरक्षण ले चुका हो उसे आगे देने का मतलब को समझ ही नहीं आता। इससे तो ये साफ हो रहा है कि वो छात्र सच में नाकाबिल था औऱ शायद जिंदगी भऱ रहेगा भी।
हमारे देश के कब्र में पाँव लटकाये बैठे नेता अपने वोटो के लिए देश को किस अंधेरे कूऐं में धकेल रहे हैं ये जितनी जल्दी समझ लिया जाए उतना ही हम सब के लिए बेहतर होगा।आरक्षण के विरोधियों की आवाज भले ही सुनी ना जा रही हो लेकिन लगातार आवाज उठा कर उन्होने ये जता दिया है कि नेताओ को अपने हित साधने से रोकने वाली ताकत देश में मौजूद है ।





मैं हर की पौडी से नहा कर पास की पंत द्वीप पार्किंग की तरफ जा रहा था कि एक छोटी सी दुकान पर रखे पुराने सिक्को पर नजर पडी। मुझे पुरानी चाजें रखने का शौक भी है इसलिए रुक गया।










