Monday, March 31, 2008

हजार के पार मेरा ब्लाग........

आज दोपहर को जब मैंने अपना ब्लाग देखा तो बेहद खुशी हुई। ढाई महीने के छोटे से समय में मेरा ब्लाग को पढने या देखने वालों की संख्या एक हजार को पार कर गई।
रीडर मीटर पूरे १००० दिखा रहा था और मेरा मन खुशी से भरा जा रहा था। भले ही ये बहुत बडी संख्या नही है, दूसरों के ब्लाग इससे भी ज्यादा देखे और पढे गये होंगें।
फिर भी एक हजार का आंकडा छूना मेरे लिए बडी बात थी। मेरा ख्याल है कि हर ब्लागर के लिए ये खुशी का लमहा होता होगा।
मेरा ये ब्लाग मेरे देश भर मे घूमने फिरने के अनुभवो पर है जिसे मैने सबके साथ बांटा है। न केवल घूमना फिरना बल्कि हर जगह की अलग कला और संस्कृति को ब्लाग पर जगह देने की मेरी कोशिश रही है।
मुझे अच्छा इस बात से भी लग रहा है कि पूरी दुनिया मैं इसे पढा जा रहा है। आगे भी अपने आप सबके साथ यायावरी के नये- नये अनुभव बांटता रहूँगा।
आपके सुझाव भी सादर आमंत्रित हैं।

Saturday, March 29, 2008

बंगाल के मुखौटे......









हमारे देश की सांस्कृतिक विविधता देखने के लायक है। आज एक सेमिनार के सिलसिले में दिल्ली के विग्यान भवन में जाना हुआ। वहां दिवार को बंगाल के पारम्परिक मुखौटों से सजाया गया था। देखते ही आखें ठहर गई उनकी खुबसूरती पर। इसमें मां काली, दुर्गा, भगवान गणेश, के मुखौटे थे। ये बंगाल में पूजा के लिए रखे जाते हैं। हालांकि पूरा पता मेरे को भी नहीं है। आप में से किसी को पता हो तो बताईये। उनके के फोटो आप सब के लिए।

Tuesday, March 25, 2008

रेत पर फैली सुन्दरता......






राजस्थान भारत का सबसे बडा राज्य है। इसकी रेतीली खूबसूरती देखते ही बनती है। सूरज की किरणों में ये धरती सोने सी चमकती नजर आती है। इस बार की छुट्टियों में अपने घर गया था राजस्थान में। वहां रेगिस्तान के लिए कुछ फोटो आप सबके लिए। इससें आपको रेतीली धरती और दूर दूर दिखाई देने वाले पेड दिखाई देंगें।

Monday, March 24, 2008

राजस्थान शेखावाटी का होली नृत्य... गीन्दड








राजस्थान के शेखावाटी इलाके में होली पर एक खास नाच किया जाता है। इसको गीन्दड कहा जाता है। इस में लडके गोल घेरे में घूमते हुए नृत्य करते हैं। ये बहुत कुछ गुजरात के डांडिया से मिलता है। इसके कुछ फोटो औऱ वि़डियो आपके लिए।

video

Tuesday, March 11, 2008

करणी माता बीकानेर....चूहों का मंदिर







बीकानेर के पास है छोटा सा कस्बा देशनोक। देशनोक करणी माता के मंदिर के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। इस मंदिर में एक खास बात है जिसने इसे दुनिया में अलग जगह खडा कर दिया है। वो है मंदिर में पाये जाने वाले हजारों चूहे।


चूहे इस मंदिर में सदियों से रहते आ रहे हैं। देशनोक बीकानेर से तीस किलोमीटर दूर है। मैं करीब सात आठ साल पहले बीकानेर गया था उस समय मैंने करणी माता के मंदिर को भी देखा था। असल में मेरे बीकानेर जाने की वजह ये मंदिर ही था।


करणी माता बीकानेर राज घराने की कुल देवी हैं। कहा जाता है उनके आर्शीवाद से ही बीकानेर की स्थापना राव बीका ने की थी। मंदिर की खासियत यहां रहने वाले चूहे है। इन चूहों को मां का सेवक माना जाता है इसलिए इनको कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जाता।


यहां रहने वाले इन चूहों के काबा कहा जाता है। मां को चढाये जाने वाले प्रसाद को भी पहले चूहे ही खाते है उसके बाद ही उसे बांटा जाता है। मंदिर हर तरफ चूहे चूहे दिखाई देते हैं। यहां पर अगर सफेद चूहा दिखाई दे जाए तो उसे भाग्यशाली माना जाता है। मुझे भी सफेद चूहे के दर्शन हो ही गये।


खास बात ये भी है कि इतने चुहे होते हुए भी मंदिर परिसर में बदबू का एहसास भी नहीं होता है। इतने चूहे होते हुए भी आज तक कोई भी मंदिर में आकर या प्रसाद खा कर बीमार नहीं पडा है। ये अपने आप में आश्चर्य है। यहां के पुजारी के घर में तो मैने चूहे किसी बच्चे की तरह ही घूमते देखे। उनके घर के कपडों से लेकर खाने के सामान तक सबमें चूहे ही चूहे दिखाई दे रहे थे।


इसके अलावा मंदिर का स्थापत्य भी देखने के लायक है। संगमरमर का बेहद खूबसूरत इस्तेमाल मंदिर में किया गया है। मंदिर के जालीदार झरोखों पर किया बारीक कुराई का काम बेहद सुन्दर है। मंदिर के विशाल मुख्य दरवाजे चांदी के बने हैं।


भारत की अद्भुत परम्परा और विश्वास का सबसे बडा उदाहरण हैं करणी माता का मंदिर। हमारे कुछ विश्वासों को सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है उनका तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता।

Saturday, March 8, 2008

शेखावाटी राजस्थान खुली कला दीर्घा






राजस्थान को जाना जाता है अपनी एतिहासिक विरासत के लिए। इसी राजस्थान में एक इलाका है जिसे शेखावाटी कहा जाता है। शेखावाटी को खुली कला दीर्घा भी कहा जाता है। इसका कारण है यहां कि हवेलियों की दीवारों पर बने चित्र।

शेखावाटी राजस्थान के मरुस्थलीय भाग में पडता है। मेरा बचपन इसी इलाके में बीता है इसलिए आज चलते हैं इसकी सैर पर। शेखावाटी का इलाकी राजस्थान के सीकर,झुँन्झुँनु, और चूरु जिलों को मिलाकर बनता है। इस इलाके अपने अमीर सेठों के लिए प्रसिद्घ है।

ये सेठ अठारहवीं सदी के शुरुआत से ही यहां से बाहर व्यापार के लिए जाने लगे। इन्होने बम्बई, कलकत्ता, मद्रास जैसे शहरों में व्यापार शुरु किया। वहां से कमाये गये पैसे से इन्होने शेखावाटी में बडी बडी हवेलिया बनाई। उन दिनों में हवेलियों को खूबसूरत चित्रों से सजाया। अपनी इन्हीं हवेलियों के लिए शेखावाटी का इलाका पूरी दूनिया में जाना जाने लगा है।

विदेशी सैलानी बडी संख्या में यहां घूमने आते है। यहां के मंडावा, फतेहपुर,नवलगढ,महनसर, बिसाऊ जैसे कस्बे हवेलियों के लिए ही जाने जाते हैं। इन कस्बों की पूरी गलियां ही इन हवेलियों से भरी पडी हैं। इसके कारण इस इलाके को खुली कला दीर्घी कहा जाने लगा है।

महनसर की तो सोने की दुकान देखने विदेशी बहुत आते हैं। इस दुकानें में सोने के इस्तेमाल से पूरी रामायण को दीवारों पर जिवंत लगते चित्रों में उकेरा गया है।

हालांकि इन हवेलियों के अधिकतर मालिक बाहर ही रहते हैं। जिसके कारण इनकी हालत बिगडती जा रही है। पर्यटन को इस तरफ बढा कर इन को खत्म होने से बचाया जा सकता है। अब कई मालिक इनकी सुध ले रहे हैं। नवलगढ कस्बे में मोरारका फाउन्डेशन ने हवेलियों को सवांरने में बहुत योगदान दिया है। एक बार इधर भी जरुर आयें।

कैसे पहुचें-

सीकर और झुँन्झुँनु दिल्ली से सीधी बस और रेल सेवा से जुडें हैं। दिल्ली से करीब तीन सौ किलोमीटर दूर है। जयपुर से ये महज दो सौ किलोमीटर की दूरी पर है।

कहां ठहरें-

इस इलाके हर कस्बे में पुराने किले हैं जिन्हे अब हैरिटेज होटलो में बदल दिया गया है। मंडावा का किला में बना हैरिटेज होटल तो काफी पुराना है। इसलिए रहना की समस्या नहीं है।राजस्थान टूरिज्म के होटल भी कई जगह हैं जिनमें रुका जा सकता है।

Friday, March 7, 2008

पुरानी दिल्ली के इतिहास का सफ़र



पुरानी दिल्ली के चटकारों के बाद चलते हैं दिल्ली के इतिहास के सफर पर। पर ये सफर कुछ अलग हैं इसमें कुछ रंग बिरंगी लाईटें हैं और कुछ आवाजें। इन को मिला कर बनाया गया है लाल किले में होने वाला लाईट एंड साउँड प्रोग्राम।


इसमें रंग बिरंगी लाईटों और आवाजों के साथ कहा गया है दिल्ली का इतिहास। पुरानी दिल्ली में लालकिले के बनने से लेकर उसके बसने की पूरी कहानी बेहद ही उम्दा तरीके से कही गया है। ये ही नहीं ब्लकि देश के आजाद होने तक की पूरी कहानी और उसमें लाल किले के योगदान को इसमें बताया गया है।


शुरुआत होती है शाहजहां के नया शहर बसाने की इच्छा और उसके लिए यमुना के किनारे के इलाके को पसंद करने से। और खत्म होती है देश की आजादी के साथ जवाहर लाल नेहरु के लाल किले में तिरंगा फहराने से।


लगभग चालीस मिनट के शो के लिए लाल किले के दिवाने खास को ही मुख्य मंच बनाया गया है। आवाजो का इतना बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है कि जब शाहजहां पहली बार किले में आते हैं तो लगता है कि ये सब आपके सामने ही हो रहा है।


अगर आप पुरानी दिल्ली को जानना और समझना चाहते हैं तो इससे बेहतर कोई और नहीं बता सकता। दिल्ली घूमने आने वालों को जरुर जाना ही चाहिए साथ ही दिल्ली वालो के भी इसे देखना चाहिए। मैने खुद इसको पांच छ बार देख चुका हूँ लेकिन फिर भी जब भी मौका लगता है इसे देख ही लेता हूँ।


इसे देखते समय आपको ऐसा लगता है कि खुद इतिहास ही आपके सामने घटित हो रहा है। आप अपने को मुगलों के दौर में ही खडा पायेंगे। इसलिए एक बार इसे जरुर देखें।


ये हर शाम लालकिला बंद होने के बाद हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में किया जाता है। मैने देखा है कि ज्यादातर लालकिला देखने वाले लोग किला घूम कर ही चले जाते हैं। उनको पता ही नहीं होता कि लाईट सांउँड भी देखने लायक है। इसलिए दिल्ली आयें तो इसे देखना ना भूलें।

Wednesday, March 5, 2008

पुरानी दिल्ली के चटकारे


दिल्ली आयें और यहां का खाना ना खायें तो बात अधूरी रह जाती है। आज बात दिल्ली के तरह तरह के खाने पीने की। मुझे तो घूमने फिरने के साथ ही पंसद है अलग अलग तरह का खाना खाना। दिल्ली में अगर खाना हो तो बात फिर पुरानी दिल्ली की करनी ही होगी।


मुगलों के जमाने से ही बसी पुरानी दिल्ली में मुगलों ने भारत भर से लोगों को लाकर यहां बसाया। लोगों के साथ ही पहुचाँ भारत भर का खान पान भी।

बात की शुरुआत परांठों वाली गली से। नाम से ही पता चल रहा है कि यहां क्या मिलता है। चांदनी चौक में शीशगंज गुरूद्वारे के आगे वाली गली ही कहलाती है परांठे वाली गली। किसी समय पूरी गली में परांठे की ही दुकाने थी लेकिन अब बदलते वक्त के साथ चार रह गयी हैं।

ये दुकाने करीब सौ से सवा सौ साल पुरानी हैं। परांठे बनाने वाले ये लोग मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं। यहां आप आलू परांठे से लेकर रबडी परांठा और खुरचन परांठां तक सब ले सकते हैं। स्वाद ऐसा है कि एक बार खा लें तो शायद जिंदगी भर भूला नहीं पायेंगें।

इन को बनाने का तरीका भी अलग है परांठों को देसी घी सकने की बजाय तला जाता है और शायद ये ही इसके स्वाद का राज भी हैं।
परांठें खां कर जब बाहर निकलें तो गली के दूसरी और चाट की मशहूर दुकान है इस की आलू टिक्की और दही भल्ले बहुत ही मशहूर हैं। दूकान का नाम तो याद नहीं आ रहा है लेकिन ये मैट्रों स्टेशन जाने वाली गली के नुक्कड पर ही है।

इसी दूकान से कुछ दूर हैं मिठाई की मशहूर घंटेवाले की दुकान। मुगलो के जमाने में दुकान के आगे घंटा टंगा रहता था जिससे इसका नाम घंटेवाला ही पड गया। घंटेवाले पर हर तरह की मिठाई मिलती है लेकिन सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है इसका सोहन हलवा। एक बार जरुर खा कर देखे।

इसके बाद आप जा सकते हैं फतेहपूरी मस्जिद की तरफ। इसके पास ही रेलवे स्टेशन जाने वाली सडक पर हैं यामू कुल्फी फलूदा। खाते ही दिल्ली की सारी गर्मी जैसे हवा हो जाती है।

ये तो हुई बात कुछ मशहूर दुकानों की लेकिन मैने तो चांदनी चौक का मजा इसकी गलियो में घूम कर उठाया हैं। यहां पर घूमते हुए फेरी लगाकर खाने पीने का समान बेचने वालों की चीजों में भी आपको स्वाद ही मिलेगा।

चाट के लिए एक और मशहूर दूकान हैं पास ही के चावडी बाजार इलाके में जिसे मैने अनजाने मैं ही खोजा था। चावडी बाजार के मैट्रो स्टेशन के सामने है ये करीब सत्तर साल पुरानी दुकान। नाम तो याद नही आ रहा है आते ही लिख दूँगा। यहां आप पानी के बताशे और कई तरह के बडों का स्वाद ले सकते हैं।कलमी बडे खाना तो ना ही भूलें।

अगर आप मासाहार के शौकिन हैं तो चले आईये जामा मस्जिद के पास मटिया महल के इलाके में यहां है मशहूर करीम। करीम अपने मुगलई स्वाद के लिए जाना जाता है। दूर दूर से लोग आते हैं यहां खाने के लिए। मेरे एक दोस्त तो लखनऊ से दिल्ली करीम का खाना खाने के लिए ही आया करते थे। तो ये है पुरानी दिल्ली के खाने का सफर। बस आईये और खाने में लग जाईये।

Sunday, March 2, 2008

बजट और बाघ........


चिदम्बरम के बजट की सराहना सभी ने की है। भले ही इसे आने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर बनाया गया हो।
लेकिन मैं दूसरी ही बात के लिए बजट की तारीफ करुँगा जिसकी तरफ लोगों और मीडिया का ध्यान नहीं गया है।
इस बार के बजट में चिदम्बरम नें बाघों को बचाने के लिए पचास करोड रुपये देने की बात कही है। ये राशि उस पैसे से अलग होगी जो बाघ संरक्षण परियोजना चलाने में खर्च की जा रही है। इस पचास करोड की मदद से बाघ को बचाने के लिए पुलिस बल तैयार किया जाएगा।
कुछ ही दिनों पहले भारत सरकार ने भी आखिरकार मान ही लिया कि भारत में बाघ तेजी से कम होते जा रहे हैं। इस साल की गई गणना में देश में १४११ बाघ गिने गये हैं। जबकि इससे पहले २००२ में हुई गणना में भारत में ३६०० बाघ गिने गये थे।
हमारे जंगलों से ये बडी बिल्ली तेजी से खत्म होती जा रही है। लगता है कि बाघ का हाल भी चीते की तरह से ही होने वाला है। कार्बेट नेशनल पार्क को बाघों के मामले में सबसे सुरक्षित माना गया है। मैं खुद भी कई बार कार्बेट गया हूँ हालांकि कभी भी मैं इस शानदार जानवर को देख नहीं पाया।
देश में आधे से भी कम बाघों का रह जाना दिखाता है कि हमारे जंगल किस कदर असुरक्षित हो चुके हैं और हमारी परियोजनाऐ किस हद तक नाकाफी साबित हुई हैं। ऐसे में उम्मीद है कि भविष्य में बनने वाले पुलिस बल के अच्छे परिणाम सामने आयेंगें।
मेरे जैसे प्रकृति प्रेमियों को जंगल में इस शानदार जीव के दर्शन हो सकेंगे। अफ्रीका में इस तरह के पुलिस बलों को बनाने के अच्छे नतीजे देखने को मिलें हैं। आशा है कि भारत में भी ये जीव सुरक्षित रह पायेगा।

Saturday, March 1, 2008

जागेश्वर तस्वीरों में............


















जागेश्वर की कुछ तस्वीरें लगा रहा हूँ। जागेश्वर के बारे में पहले ही लिख चुका हूँ लेकिन तब फोटो नहीं लगा पाया था। अब फोटो को डिजिटल करवाने के बाद आप सब के लिए पोस्ट कर रहा हूँ।