Thursday, February 28, 2008

ॠषिकेश अध्यात्म का नगर


हरिद्वार से ३० किलोमीटर दूर है ॠषिकेश। ॠषिकेश को पवित्र तीर्थ माना जाता है। यहां पर बहती गंगा की खूबसूरती तो देखती ही बनती है।


ॠषिकेश की सबसे मशहूर जगह हैं लक्ष्मण झूला। तारों पर झूलता ये पुल तो देखन के लायक है। पुल के बीच में खडें होकर नीचे बहती गंगा को देखना अविस्मरणीय अनुभव है। ॠषिकेश में गंगा पहाड से उतरने के कारण तेजी से बहती है। इसके तेज बहाव को लक्ष्मण झूले पर खडा होकर महसूस किया जा सकता है।


लक्ष्मण झूला पार करके आप गंगा के दूसरे किनारे पर पहुंचते है। इस तरफ देखने के लिए बहुत सारे आश्रम और मंदिर हैं। पुल के पास ही है तेरह मंजिली मंदिर। इस मंदिर में हर देवी देवता का मंदिर बनाया गया है। उसके बाद स्वर्ग आश्रम और परमार्थ निकेतन देखा जा सकता है।


परमार्थ निकेतन में अनाथ और गरीब बच्चों के लिए गुरुकुल बनाया गया हैं। यहां बच्चों को पारम्परिक शिक्षा के साथ ही आध्यात्म और वेदों की शिक्षा भी दी जाती है। परमार्थ निकेतन की गंगा आरती को बेहद प्रसिद्ध है।


हर शाम परमार्थ निकेतन के सामने गंगा के किनारे आरती की जाती है। ठंडी बहती हवा के बीच हजारों दीपकों की झिलमिलाती ऱोशनी को देखना अद्भुत अनुभव है। मैंने जब पहली बार आरती को देखा तो देखता ही रह गया था।


ॠषिकेश अपने योग के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। बहुत से आश्रमों में योग का प्रशिक्षण दिया जाता है। दुनिया भर से लोग यहां योग सीखने के लिए आते है। बहुत ही मामूली सी फीस देकर भी यहां योग सीखा जा सकता है।


जिंदगी की भाग दौड से ऊब होने लगी हो और आप दुबारा से तरोताजा होना चाहते हैं तो ॠषिकेश आ जाईये। कुछ दिन गंगा के किनारे बिताने से ही आप सारा तनाव भूल जाते हैं।


ॠषिकेश से तीस किलोमीटर दूर है नीलकंठ महादेव। ये भगवान शिव का सदियों पुराना मंदिर है। यहां तक जाने के लिए बारह किलोमीटर का पैदल रास्ता भी है। जंगल से घिरे इस रास्ते से जाने का अपना अलग ही मजा है। लगभग १००० मीटर की उँचाई पर बना है ये मंदिर।


मंदिर तक जाने के लिए ॠषिकेश से टैक्सी मिल जाती हैं। मैं जब गया था तो यहां तक जाने वाली सडक की हालत बेहद ही खराब थी। ॠषिकेश से सवारी के हिसाब से भी चलने वाली टैक्सी भी ली जा सकती है।


रिवर राफ्टिग-


ॠषिकेश अब रिवर राफ्टिग के लिए भी जाना जाता है। पहाडों से तेजी से उतरती गंगा की लहरों पर राफ्टिंग करने के रोंमांच की तुलना ही नहीं की जा सकती। राफ्टिग के लिए यहां से दस किलोमीटर दूर शिवपुरी जाया जा सकता है। मेरा राफ्टिग पर पहले लिखा लेख पढें।


कहां ठहरें-


हर बजट के होटल हैं इसलिए यहां पर ठहरने में कोई दिक्कत नहीं है। यहां के आश्रमों में भी रुका जा सकता है। लेकिन आश्रम के नियमों को मानना होगा।


कैसे पहुँचें-


दिल्ली से दो सौ तीस किलोमीटर दूर है। दिल्ली से सीधी बस सेवा और रेल मिल जाती है।

Wednesday, February 27, 2008

चम्बा-अनजानी खूबसूरती










ॠषिकेश से टिहरी जाने वाली सडक पर हैं एक हिल स्टेशन चम्बा। चम्बा का नाम सुनते ही सबको हिमाचल याद आता है। लेकिन ये चम्बा उत्तरांचल में टिहरी से दस किलोमीटर पहले है।



समुद्र तल से सोलह सौ मीटर की उँचाई पर बसा है ये हिल स्टेशन है। मेरी टिहरी यात्रा में मैने रात को चम्बा मे रुकने का फैसला किया। जिस रिजोर्ट में मै रुका वो पहाड की चोटी पर था, लगभग दो हजार मीटर की उँचाई पर।

रात के आठ बज चुके थे। चारों और फैला कोहरा माहौल को रोमानी बना रहा था। जुलाई के महीने भी अच्छी ठंड लग रही थी। वहां पहुच कर कैम्प फायर करते हुए हमने खाना खाया। रात को पहाड की चोटी से चारों और जगमगाती लाईट तारों का सा आभास दे रही थी।


चम्बा की सुबह तो बेहद सुहानी थी। सुबह सुबह बत्तखों की आवाज से ही आंख खुली। रिजोर्ट में बत्तख पाली गई थी। दरवाजे पर उनके चहचहाने से ही मेरी सुबह हुई। उसके बाद कमरे से बाहर आकर चम्बा की असली सुन्दरता को देखा।


हल्की हल्की धुंध फैली हुई थी। पहाड की उँचाई से चम्बा घाटी मैं पहाडी खेतों का नजारा दिखाई दे रहा था। चारों और शांति पसरी पडी थी। उसके कुछ देर के बाद में निकल गया टिहरी के लिए लेकिन मन में चम्बा की खूबसूरती को बसाये।

क्या देखें-

चम्बा के आस पास देखने के लिए कई मंदिर हैं। चम्बा का इलाका अपने फलों के बागों के लिए प्रसिद्ध है। आस पास के सेब के बगीचो को देखा जा सकता है। रिजोर्ट आप के लिए घूमने की व्यवस्था कर देते हैं। यहां से नई टिहरी दस किलोमीटर है वहां जाकर टिहरी बांध को देखा जा सरकता हैं। मसूरी आकर भी चम्बा आया जा सकता है। मसूरी यहां से साठ किलोमीटर दूर है।

कहां ठहरें-

चम्बा को देख कर यहां कुछ अच्छे रिजोर्ट खुल गये हैं, थोडे मंहगे हैं लेकिन रहने के लिए अच्छी सुविधा ये देते हैं। अब कुछ सस्ते होटल भी बन गये हैं।

कैसे पहुचें-

ॠषिकेश से सत्तर किलोमीटर दूर है। बस की सुविधा है। रेल से हरिद्वार तक आकर हरिद्वार से भी बस ली जा सकती हैं। दिल्ली से लगभग तीन सौ किलोमीटर दूर है चम्बा। दिल्ली से भी सीधी बस सेवा है।

Tuesday, February 26, 2008

औली तस्वीरों में....







Sunday, February 24, 2008

औली- बर्फीली ढलानों का रोमांच


बद्रीनाथ से तीस किलोमीटर पहले आता है जोशीमठ। जोशीमठ से सोलह किलोमीटर दूर है भारत का सबसे अच्छा स्की रिजोर्ट औली। औली की ढलानो को भारत ही नहीं दुनिया की सबसे अच्छी ढलानों में शुमार किया जाता है। जोशीमठ दिल्ली से पाँच सौ किलोमीटर और हरिद्वार से तीन सौ किलोमीटर दूर है।



यहां नवम्बर से मार्च तक स्की का मजा लिया जा सकता है। औली बर्फ पिघलने के बाद भी इतना ही खुबसूरत रहता है। गर्मी के मौसम में यहां ढलाने घास के ढक जाती हैं। इन घास के मैदानों को गढवाल में बुग्याल कहा जाता है।


जोशीमठ से यहां तक जाने के लिए सडक तो है ही आप चाहें तो रोप वे से भी जा सकते हैं। इस चार किलोमीटर लम्बे रोप वे से यहां की खूबसूरती को आसानी से देखा जा सकता है। औली की तस्वारो में देखिये इसकी दिव्य सुन्दरता को.................................... तस्वीरें मेरे भाई की नजर से

Saturday, February 23, 2008

भारत का आखिरी गाँव- माणा







बद्रीनाथ से दो किलोमीटर की दूरी पर है भारत का आखिरी गांव माणा। चीन की सीमा पर उत्तराखंड का ये आखिरी गांव है। इस गांव में तिब्बती मूल के बाशिंदे रहते हैं। ये लोग गर्मी के मौसम में यहां रहते हैं और सर्दी में नीचे के इलाकों में चले जाते हैं। यहां ये आप इन लोगों के हाथों के बने ऊनी कालीन खरीद सकते हैं।

यहां पर देखने के लिए हैं भीम पुल जिसे स्वर्ग यात्रा पर जाते हुए भीम ने सरस्वती नदी के पर रखा था। ये एक विशाल पत्थर हैं जिसे यहां से निकलने वाली नदी पर भीम ने रखा था। यहां पहाड में बने छेद से बडी ही तेजी से पानी निकलता हैं। इतने सालों के बाद भी पानी की तेजी मुझे याद है।

यहीं पर व्यास गुफा और गणेश गुफा हैं। मान्यता है कि व्यास गुफा में बैठकर महर्षि व्यास ने भगवान गणेश से महाभारत लिखवाई थी। जिसे गणेश ने गणेश गुफा में बैठकर लिखा था।

साथ ही यहां आप भारत की आखिरी चाय की दुकान से चाय पीने का आनंद भी उठा सकते हैं।

अगर पहाडी रास्तों पर चलने के शौकीन हैं तो यहां से पांच किलोमाटर दूर वसुंधरा झरने तक जा सकते हैं।यहा के अनुभव मेरे ही हैं सालों पुराने लेकिन फोटो नये हैं मेरे छोटे भाई के कैमरे से ................

साईन बोर्ड को फोटो से माणा के आस पास की जगहों का पता लग जाएगा।

Thursday, February 21, 2008

बद्रीनाथ- स्वर्ग का एहसास


























हरिद्वार से तीन सौ किलोमीटर दूर है बद्रीनाथ। बद्रीनाथ को चार धामों में से एक माना जाता है। आदि शंकराचार्य ने नौं वीं शताब्दी में इसकी स्थापना की थी।

मैं करीब पन्द्रह साल पहले यहां गया था। उस समय की याद तो आज भी है लेकिन इतनी नहीं कि आप सब को बता सकूँ। लेकिन ये तो आज भी याद है कि यहां पहुंच कर एसा लगा था कि जैसे मैं स्वर्ग में आ गया हूँ। बद्रीनाथ साढे तीन हजार मीटर से भी ज्यादा कि उँचाई पर है।

इसको भगवान विष्णु का स्थान माना जाता है । मेरे छोटे भाई ने कुछ महीने पहले बद्रीनाथ की यात्रा की थी। उसके कुछ फोटो आप के लिए जिससे आप भी यहां कि सुन्दरता को देख सकें।

Tuesday, February 19, 2008

टिहरी

नई टिहरी शहर ॠषिकेश से गंगोत्री जाने वाले रास्ते पर है। पहले पुराना टिहरी भागरथी नदी पर बने बांध में डूब गया। जिसेक बाद ये नया शहर बसाया गया है।

मेरा टिहरी जाना भी बांध के कारण से ही हुआ। टिहरी का पहला टरबाईन शुरू होने वाला था। अपने न्यूज चैनल से इसको कवर करने के लिए मैं टिहरी गया था। ॠषिकेश से लगभग अस्सी किलोमीटर दूर है टिहरी।

पुराना टिहरी शहर गंगा की तलहटी मैं बसा था जो समुद्र तल से ६०० मीटर की उंचाई पर था। नये टिहरी को पहाड की चोटी पर बसाया गया है। इसलिए समुद्र तल से इसकी उँचाई १५०० मीटर से लेकर १९०० मीटर के बीच है। इतनी उँचाई पर होने के कारण एक हिल स्टेशन पर होने का एहसास भी यहां आकर किया जा सकता है।

इस नये बसे शहर की पहचान या खासियत इसकी बसावट में ही है। शहर को योजना को साथ बनाया गया है। करीने से बने बाजार, सडके, और गलियां शहर को बेहद खूबसूरत बना देती हैं। सभी घरो को एक जैसा ही बनाया गया है।

दूर से देखने पर लगता है कि फिल्मों में दिखाई देते किसी यूरोपिय शहर में आ गये हैं। इसके अलावा शहर की खासियत ये है कि इसे पुराने टिहरी शहर का रुप देने की कोशिश की गई है। पुराने टिहरी शहर के घँटाघर को हूबहू नये टिहरी में बनाया गया है।

नये टिहरी से चौबीस किलोमीटर दूर है टिहरी बांध। इस विशाल बांध को देखने के लिए टिहरी आया जा सकता है। बांध अपनी तरह का खास हैं इसे राक फिल तकनीक से बनाया गया है जिससे भूकम्प का असर इस पर नहीं हो सके।

अब बांध से बनी झील को सरकार पर्यटन को बढावा देन के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। इसके लिए झील में पानी में खेले जाने वाले खेल यहां शुरु करने की योजना बनाई जा रही है। वाटर स्पोर्टस की हर सुविधा यहां पर दी जाएगी।

Tuesday, February 12, 2008

हरिद्वार- हरि की भूमि


हरिद्वार को हरि का द्वार कहा जाता है। हरिद्वार उत्तराखंड का सबसे पहला शहर है औऱ उत्तराखंड को सदियों से देव भूमि माना जाता है। इस देव भूमि मे जाने के रास्ते पर होने के कारण ही हरिद्वार नाम मिला।


हरिद्वार को धर्म की नगरी माना जाता है। सैकडों सालों से लोग मोक्ष की तलाश में इस पवित्र भूमि में आते रहे हैं। हरिद्वार का ये महत्व यहां बहने वाले गंगा नदी के कारण ही है। गंगा को हिन्दू धर्म में पापों को धोने वाली माना जाता है। पहाडों से उतर कर गंगा सबसे पहले हरिद्वार में ही आती है। मैं जब भी यहां आता हूं हमेशा ही एक शांति महसूस होती है।


शहर मे आते ही सबसे पहले गंगा दिखाई देती है। कल कल बहती इस नदी को देखते ही आपकी मन खुशी से भर जायेगा। बचपन से ही मैं यहां आता रहा हूँ। लेकिन कालेज में आने के बाद मेरा हरिद्वार आना बढ गया। क्योंकि मेरे दो दोस्त यहीं से हैं। अब तो जब तब हरिद्वार में आता रहता हूँ।


हरिद्वार में मेरी पसंदीदा जगह है हर की पौडी। ये गंगा के किनारे का घाट है। कहा जाता है कि हर की पौडी में पवित्र अमृत कलश की कुछ बूँदें गिरी थीं। वैसे तो गंगा में नहाने को ही मोक्ष देने वाला माना जाता है लेकिन कहा जाता है कि हर की पौडी में स्नान करने से जन्म जन्म के पाप धुल जाते हैं।


यहां गंगा के किनारे आप घंटों बैठे रह सकते हैं। पूरे भारत का दर्शन अगर एक ही जगह पर करना चाहते हैं तो बस हर की पौडी पर आ जाईये। भारत के हर कोने से आये लोग यहां दिखाई दे जायेंगें। गंगा मे पैर रखकर बैठने से ही जो सूकून मिलता है उसे बताया ही नहीं जा सकता।


उसके बाद आप देख सकते हैं हरिद्वार की सबसे अनोखी चीज जिसके लिए हर रोज हजारों की भीड हर की पौडी पर आती है। वो है हर शाम होने वाली मां गंगा की आरती। हर शाम हजारों दीपकों के साथ गंगा की आरती की जाती है। पानी में दिखाई देती दीयों की रोशनी हजारों टिमटिमाते तारों की तरह लगती है। इस आरती को देखने के लिए शाम होने से पहले ही पहुंचना होगा नहीं तो पैर रखने की जगह भी नहीं मिलेगी।


हर की पौडी के पीछे के पहाड पर बना है मनसा देवी का मंदिर। मंदिर तक जाने के लिए पैदल रास्ता है। लेकिन मंदिर जाने के लिए रोप वे भी है। मैं तो पहली बार रोप वे पर मनसा देवी मंदिर जाने के लिए ही बैठा था।


गंगा के दूसरे किनारे पर हैं चण्डी देवी मंदिर। नील पर्वत पर हैं ये मंदिर यहां तक जाने के लिए तीन किलोमीटर का पैदल रास्ता हैं। जंगल से घिरे रास्ते पर चलना अच्छा लगता है। अब इस मंदिर के लिए भी रोप वे बना दिया गया है। रोप वे के बाद बडी संख्या में लोग मंदिर में जाने लगे हैं। इसके अलावा हरिद्वार में बहुत सारे मंदिर और आश्रम हैं जिन्हे देखा जा सकता है।


जिनको जंगल और जानवर अच्छे लगते हैं वो लोग भी हरिद्वार आ सकते हैं। हरिद्वार में राजाजी नेशनल पार्क भी है। यहां वन विभाग से अनुमति लेकर घूमा जा सकता है। यहां जंगली हाथियों को आसानी से देखा जा सकता है।


कहां ठहरें-

हरिद्वार में रुकने के लिए मंहगे होटलों से लेकर धर्मशाला तक सभी कुछ हैं। इसलिए हर बजट के लिए यहां रुकने की सुविधा है। यहां बहुत से आश्रमों में भी रुका जा सकता है।

Saturday, February 9, 2008

मसूरी- पहाडों की रानी(२)

कैंप टी फाल से मसूरी वापसी के रास्ते में आता है लाल बहादुर शास्त्री प्रसाशनिक प्रक्षिक्षण अकादमी। यहां सिविल सेवा परीक्षा पास करके आये अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है। अनुमति लेकर यहां घूमा जा सकता है।

इस के पास ही है तिब्बती मठ। इस मठ को तिब्बत से आये शरणार्थियों ने बनाया है। बौद्ध धर्म के असली रुप को यहां देखा जा सकता है। चारों और घने जंगल से घिरा है ये खूबसूरत मठ।

इसके बाद मैं चल पडा धनौल्टी की ओर। मसुरी से लगभग तीस किलोमीटर दूर टिहरी जाने वाली रोड पर है,ये शांत और खूबसूरत जगह। अब धीरे घीरे एक हिल स्टेशन के रुप में ये अपनी पहचान बनाता जा रहा है।

धनौल्टी देवदार के जंगल से घिरा है। अब देवदार का जंगल ही इसकी पहचान बन चुका है। यहां रहने के लिए कुछ होटल बन गये है। गढवाल मंडल टूरिज्म का गेस्ट हाउस भी है। शहर की भीड भीड से दूर आना चाहते हैं तो धनौल्टी आदर्श जगह है। मसूरी घूमने के बाद यहां ठहरा जा सकता है।

धनौल्टी से सात किलोमीटर दूर है सुरकंडा देवी का मंदिर। पूरे इलाके में मंदिर की बडी मान्यता है। मंदिर के लिए दो किलोमीटर की सीधी चढाई करनी पडती है। मंदिर दस हजार फीट की ऊँचाई पर बना है। इतना ऊँचाई से चारों औऱ के पहाडों का बडा ही सुन्दर दृश्य देखने को मिलता है।

गढवाल में मान्यता है कि शादी को बाद जोडे को इस मंदिर में जरुर लाया जाता है। इसलिए यहां बडी संख्या में नव विवाहित जोडे देखने को मिलते हैं।

इसके अलावा मसूरी के आस पास के इलाके में कई झरने हैं जिनको देखा जा सकता है। तो पहाडो की इस रानी को देखने एक बार जरुर आईये।


कहां ठहरें-

मसूरी में ठहरने के लिए होटलों की कमी नहीं है। हर बजट के लिए होटल यहां मिल जाते हैं। यहां अंग्रेजों के जमाने के बंगलों को होटलों में बदल दिया गया है। इनमें रुकना एक यादगार अनुभव है लेकिन बजट के लिहाज से ये थोडे मंहगे हैं। पहाड के अनुभव लेने के लिए धनौल्टी में रुकना भी अच्छा है।


कैसे पहुंचे-

दिल्ली से मसुरी के लिए सीधी बस मिल जाती है। लगभग छ से सात घंटे में मसूरी पहुंच जायेंगें। देहरादून तक रेल से जाकर आगे का सफऱ बस या टैक्सी से किया जा सकता है। मसूरी देहरादून से तीस किलोमीटर है। देहरादून के लिए दिल्ली से शताब्दी रेल भी जाती है।

Tuesday, February 5, 2008

मसूरी- पहाडों की रानी


मसूरी उत्तराखंड का एक जाना पहचाना हिल स्टेशन है। इसकी खूबसूरती के कारण इसको पहाडों की रानी कहा जाता है।


मेरी मसूरी से जान पहचान बहूत पुरानी है। जहां तक मुझे याद आता है कुछ पांच या छ साल की उम्र में पहली बार मसुरी गया था। उस वक्त की ज्यादा याद तो नहीं है लेकिन फिर भी माल रोड पर घूमना आज भी यादों में बसा है।


फिर पिछले तीन चार साल में कई बार मेरा मसुरी जाना हुआ। अपने ये अनुभव ही मैं सबके साथ बांट रहा हूं। देहरादून घाटी से तीस किलोमीटर दूर है मसूरी। देहरादून से ही चढाई शुरु हो जाती है। साथ ही शुरू हो जाता है हसीन पहाडी वादियों का सफर भी।


समुद्र से दो हजार मीटर की उंचाई पर बसा है ये प्यार हिल स्टेशन। इस हिल स्टेशन को अंग्रेज आफिसर ने १८२५ में खोजा था। उसके बाद से ही दिल्ली का गर्मी से बचने के लिए मसूरी अंग्रेजों की पसंदीदा जगह बन गया।


अंग्रजों के जमाने में बनी इमारतें आज भी उस दौर की याद ताजा करवा देती हैं। हर हिल स्टेशन की तरह ही मसूरी की पहचान भी इसकी माल रोड ही है। ये सडक पूर्व में पिक्चर पैलेस से लेकर पश्चिम में पब्लिक लाईब्रेरी तक फैली है।


सडक के एक ओर देहरादून घाटी है जहां से देहरादून शहर दिखाई पडता है। रात को माल रोड पर खडे होकर देहरादून की जगमगाती रोशनियों को देखना बेहद खूबसूरत लगता है। शाम को तो जैसे पूरा मसूरी ही माल रोड पर निकल आता है।


उंचाई पर बसे होने के कोहरा और बादल हर समय यहां खेल खेलते रहते हैं। कभी तो माल रोड आपको धूप में चमकती नजर आती है औऱ अचानक ही बादलो से ढक जाती है। शाम के समय घाटी से उठते बादलों के बीच माल रोड पर घूमने के आनंद को बता पाना संभव ही नहीं है।


इस सडक पर चाहे जितना भी घूमें आपका मन कभी नहीं भरेगा। माल रोड पर कपडों, और सजावटी समानों की दुकाने हैं।माल रोड का एक सिरा पहूचता है पिक्चर पैलेस पर जो मसूरी का बाजार है।


माल रोड के बीच में है रोप वे स्टेशन जहां से केबल कार में बैठकर मसूरी की दूसरी सबसे उंची चोटी पर पहूंचा जा सकता है। इस चोटी को गन हिल भी कहा जाता है, क्योकि अँग्रेजों के जमाने में यहां तोप रखी जाती थी। इस तोप को दिन में एक बार चलाया जाता था जिससे लोग सही समय का अंदाजा लगाते थे।


मुझे कहा गया था कि गन हिल से पहाडों के सुन्दर नजारे दिखाई देते हैं। लेकिन यहां पहुच कर दुख हुआ कि यहां चोटी के चारों ओर खाने पीने के दुकाने और रेस्टोरेट बना दिये गये हैं। जिससे नजारो के नाम पर आपको सिर्फ दुकाने ही दिखाई देती देती है। सही नजारे देखने के लिए खुली जगह तलाश करना पडती हैं। इसलिए यहां से तो मै जल्दी ही वापस हो लिया।


वापस आकर मैं चल पडा उस झरने को देखने जिसके लिए मसूरी पूरी दूनिया में जाना जाता है। इस को कैम्प टी फाल के नाम पहचाना जाता है। मसूरी से लगभग १५ किलोमीटर दूर है ये झरना।


मैंने इसकी खूबसूरती के बारे में आज तक बस सुना ही था। सडक से कुछ नाचे उतर कर जाना पडता है इसको देखने। बडे मन से मै इसको देखने पहूचा। लेकिन यहां आकर तो मन गनहिल से भी ज्यादा खराब हो गया। घाटी में बहते इस झरने को भी चारो और से उंची उंची कंक्रीट की बदसूरत इमारतो से घेर दिया गया है। जिनमे रेस्टोरेंट खोल दिये गये हैं। इसमें नहाते समय आपको लगेगा ही नहीं कि किसी पहाडी झरने में नहा रहें हैं। झरने के जो पानी इकठ्ठा हो रहा था उसमें भी गंदगी थी। मैं तो बिना नहाये ही वापस लौट आया। लेकिन मैं सोच में पड गया कि पर्यटन सुविधाऐं बढाने के नाम पर हम प्रकृति के साथ कैसा खिलवाड करते जा रहे हैं?

Sunday, February 3, 2008

लहरों का मजा-रिवर राफटिंग




ॠषिकेश से लेकर श्रीनगर तक का पूरा इलाका रिवर राफटिंग करने वालों के लिए स्वर्ग बन चुका है। इसी रास्ते पर आने वाले शिवपुरी को सबसे अच्छा माना जाता है रिवर राफटिंग करने के लिए। अब तो श्रीनगर तक जगह जगह राफटिंग करवाने वाले कैंप खुल चुके हैं।


सडक से ही गंगा के किनारे ये कैंप दिखाई देने लगते हैं। मुझे तो अपनी श्रीनगर यात्रा में राफटिंग करने का मौका नहीं मिला। लेकिन मेरा मन लगातार कैंप में जाने के लिए मचल रहा था। इसलिए मैंने एक कैंप में रुक कर आगे के लिए जानकारी ली।


मुझे पता चला कि सभी के ॠषिकेश में बुकिंग आफिस हैं जहां से ॠषिकेश पहुच कर भी बुकिंग करवाई जा सकता है। राफटिंग के साथ एक रात के लिए कैप में रुकने के लिए लगभग १२०० रुपये लिए जाते है। इसमें रुकने के दौरान खाना पीना भी शामिल है। साथ ही ॠषिकेश से कैंप साईट तक लाने ले जाने का खर्चा भी इसमें है। इसलिए यहां राफटिंग करना मुझे मंहगा भी नहीं लगा।


राफटिंग कैंप के बस में बैठकर लिए कुछ फोटो लगा रहा हूं। औऱ जल्दी ही मै राफटिग के लिए जाउंगा उसके बाद अपने अनुभव को आप के साथ बाटूंगा।