Thursday, November 13, 2008

बर्फीले रेगिस्तान सियाचिन का सफर (१)

अभी भारतीय सेना के साथ सियाचिन जाने का मौका मिला। ये ऐसा मौका था जो जिंदगी में किस्मत वालों को ही मिलता है। मैने तो तुरन्त हां कर दी। दरअसल भारतीय सेना लगातार दूसरे साल आम लोगों के दल को लेकर सियाचिन जा रही थी। जिसमें मिडिया के साथ ही सेना के तीनो अंगो के अधिकारी , आम नागरिक और सैनिक स्कूल के बच्चे शामिल थे।

ये पूरे एक महीने का सफर था जिसमें पहले कुछ दिन हमें लेह में बिताने थे जहां पर रहकर हमें वहां के वाताबरण में अपने आप को ढालना था। दल में कुल मिलाकर करीब पैंतीस लोग शामिल हुए। सफर की शुरुआत हुई चंडीगढ से जहां से बायुसेना के विशाल मालवाहक जहाज ए एन ३२ से सभी लोगो को लेह तक जाना था। ये दुनिया के सबसे बडे जहाजो में से एक है जिसमें बै‌ठना अलग ही अनुभव रहा हालांकि मैं इस सफर में साथ नहीं था हां लेह से बापसी में मैने इस जहाज से सफर किया। कुछ कारणो से मै दो तीन दिन बाद लेह जा पाया ।



लेकिन दिल्ली से लेह का हवाई सफर भी कम रोमाचक नहीं है। इस पूरी उडान में लगभग एक घंटा लगता है। आधे घंटे बाद ही आप हिमाचल के रोहतांग दर्रे पर होते हैं और उसके बाद शूरू होता है बर्फ से ढके पहाडों का सिलसिला जो उपर से देखने में बेहद शानदार लगता है। आप भी देखिये इन नजारों को.............................





सुबह करीब सात बजे हमारा विमान लेह में उतरा। पायलेट पहले ही बता चुके थे कि बाहर का तापमान दो डिग्री है सुनते ही मुझे तो ठंड लगने लगी क्योकि दिल्ली में तो तापमान चालिस के पार था और में तो टी शर्ट में ही था। उतरते ही तेज धूप से सामना हुआ मैने धूप का चश्मा लगा लिया । लेह में चश्मा लगाना बेहद जरुरी है लेकिन मेरा सामान आने में काफी देर लग गई और तब तक मै कापने लगा था । खैर सामने आने के बाद मैने जैकेट पहनी । लेह हवाई अड्डा बेहद छोटा है।




बाहर आते ही मै तो दूरर्दशन केन्द्र चला गया जो सामने ही था । यही से सेना का गाडी मुझे लेकर कारु चली गई। जो लेह से करीब चालीस किलोमीटर दूर लेह मनाली रोड पर सेना का कैम्प है। ये कैम्प सिन्धु नदी के किनारे बना है।




इस महान नदी को देखने का मेरा पहला अवसर था जिसके नाम पर ही हमारे देश को पहचान मिली है। शाम को देर तक मै इसके किनारे पर बैठा रहा। शाम के साथ ही ठंड भी बढने लगी थी।











अगले दिन ही हमे सियाचिन बैस कैम्प के लिए निकलना था जो कि लेह से दौ सो किलोमीटर दूर था। अगले दिन सुबह ही तैयार हो कर हम लेह पहुचे जहां हमारी रवानगी से पहले सेना ने छोटा सा कार्यक्रम रखा था। वहां फ्लैग आफ के बाद करीब बारह बजे हम सियाचिन बैस कैम्प के लिए चल दिये। साथ के सभी लोग पिछले पांच दिनो से लेह मे ही थे इसलिए सभी जगह घूम चुके थे मुझे तो गाडी से ही देखकर काम चलाना पडा।





लेह से निकलते ही आस पास की खूबसूरती दिखाई देने लगती है। दूर दूर तक सूने पहाड दिखाई देते है हरियाली का कही कोई नामों निशान नही है। इतनी ऊचाई पर ठंड औक बर्फ के सिवाये कुछ नही दिखाई देता है। लेकिन इन सूने पहाडो की अलग ही सुन्दरता है।

































खैर लेह से चलने के दो घंटे बाद हम पहुचे खारदूंगला जो कि दुनिया मे सबसे ऊंचाई पर बनी सडक है। करीब १८३८० फीट पर है खारदूगला। जब हम यहां पहुचे तो बेहद ठंड पड रही थी यहा का तापमान शून्य से दस डिग्री नीचे था। साथ ही भारी बर्फ भी पड रही थी । यहा हमें पता चला कि आगे मौसम और भी खराब हो रहा है। कुछ देर यहां रुक कर हम आगे चल दिये................

4 comments:

Vidhi said...

Good blogging....and very nice narrative.

Udan Tashtari said...

अच्छा लग रहा है आपकी रोमांचकारी यात्रा का विवरण पढ़ना. जारी रहिये.

Manish Kumar said...

vimaan ke oopar se kheencha chitra behad manmohak hai

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत बढ़िया लग रहा है यह यात्रा वृन्तात पढ़ना ..चित्र भी बहुत अच्छे लिए हैं आपने