Saturday, April 26, 2008

आरक्षण का विरोध अदालत में




ये फोटो जो दिखाई दे रही है उसमें शायद कुछ भी खास ना दिखाई दे। पुलिस और लोगों के बीच खींच तान के दृश्य तो आम हैं इस देश के लिए।
इसमें खास ये है कि ये आरक्षण को लेकर सरकार की मनमानी के खिलाफ उठी आवाज है। जिसे दबाया जा रहा है। फोटोमें दिखाई दे रहा शख्स भी कोई साधारण लडका नहीं कि जिसे किसी राजनैतिक पार्टी ने बहला फुसला कर सरकार का विरोध करने के लिए मना लिया हो। या फिर पैसा देकर लाया गया हो जैसी पैसे से खरीदी भीड कई बार दस जनपथ पर पिछले दिनों दिखाई दी थी।

इस बार का बजट तो याद ही होगा जब बजट की घोषणा संसद में होते ही किसानो की भीड दस जनपथ पर उमड आई थी। लग रहा था कि जैसे देश का किसान को पता ही था सरकार क्या करने वाली है।

मैं फिर से आज के मुद्दे पर ही आता हूँ। फोटो में दिखाई दे रहा शख्स देश के सबसे अच्छे अस्पताल और मेडिकल कालेज अखिल भारतीय आर्युविग्यान संस्थआन यानि एम्स में पढने वाला डाक्टर है।

एम्स की प्रवेश परीक्षा में देश भर के बच्चे बैठते हैं जिसके बाद पचास को इस जगह पढने के लिए चुना जाता है। यानि यहां आने वाला देश के सबसे बेहतर में से एक होता है।

इतने मुश्किलों से यहां आने के बाद इनको क्या हुआ कि ये पुलिस के डंडे खाने, सरकार का विरोध करने के लिए सडको पर उतर पडे? चाहते तो आराम से पढकर बेहतर भविष्य के सपने बुन सकते थे। लेकिन इन्होने इसकी जगह सरकार की उस नीति का विऱोध करने की ठानी जिसकी आग में करीब अठारह साल पहले देश का भविष्य जल उठा था।

आज फिर लगभग वही स्थिति बन चुकी है जब सरकार केन्द्रीय उच्च शिक्षण संस्थाओं में ओबीसी के लिए आरक्षण देने की नीति वोट बैक की खातिर बनाने जा रही

सुप्रीम कोर्ट में आया तो अदालत ने भी सरकार के पक्ष में फैसला सुना दिया। लगा कि अब सारे विरोध शांत हो जायेगे। लेकिन फैसला भी घूमा फिरा कर आया जिसके कारण आज तक भ्रम की स्थिति बनी हुई है। आरक्षण तो अब लागू हो ही जाएगा लेकिन पोस्ट ग्रेजुएट में इसे लागू ना किया जाए या नहीं इस पर मतभेद हैं।

एम्स और दूसरे मेडिकल कालजो के छात्र इसका ही विरोध करने के लिए अदालत में धरने पर आये। जिस देश में सरकार मनमानी के अलावा कुछ ना करती हो वहां शायद आखिरी उम्मीद अदालत ही हैं। लेकिन यहां भी उनकी आवाज को सुनने की जगह पुलिस बल से दबाने की कोशिश की गई।

ये तो यहां आखों पर पट्टी बाध कर बैठी न्याय की देवी को बताने के लिए आये थे कि सरकार आप की भी नहीं सुन रही लेकिन उनकी आवाज को उठने ही नहीं दिया गया।
पचास या सौ कि संख्या में आये छात्रों को बडी संख्या में आये पुलिस वालों ने भर भर कर गाडियों में डाला जैसे कि किसी अपराधी से निपटा जा रहा हो। उनको घसीटा गया, थप्पड मारे गये। लोकतंत्र के लिए शर्म का दिन जहां लोगों को बात रखने की आजादी भी नहीं दी जा रही है।
मैं ये सब इसलिए लिख पा रहा हूँ कि सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को हुए इस विरोध को बतौर पत्रकार मैने भी देखा था । कुछ लोगों ने लिखा भी कि ये लोग अपने स्वार्थ के कारण विरोध कर रहे हैं क्योकि इनहें भी आगे पोस्ट ग्रेजूएट में जाना है। इस दुनिया में बिना स्वार्थ के तो कुछ भी नहीं होता ऐसे में स्वार्थ मान भी लिया जाया तो क्या इससे उनके विरोध के अधिकार को छीना जा सकता है।

भारत जैसे देश मे जहां पाच छ सौ लोग संसद में बैठकर देश की किस्मत को फैसला करते हो वहा ये हो सकता है और हो भी रहा है। मुझे एक और बात आजकल दिखाई दे रही है कि पिछडो के हितो की बात करना आज कल बुद्धिजीवी होने की पहचान बन गया है। भले ही उससे पिछडो का हित हो रहा हो या नहीं।
आरक्षण की बैसाखी थमा कर किसी का भला किया जा सकता है ये मेरे समझ से बाहर है। जो एक बार ग्रजुएट में आरक्षण ले चुका हो उसे आगे देने का मतलब को समझ ही नहीं आता। इससे तो ये साफ हो रहा है कि वो छात्र सच में नाकाबिल था औऱ शायद जिंदगी भऱ रहेगा भी।

हमारे देश के कब्र में पाँव लटकाये बैठे नेता अपने वोटो के लिए देश को किस अंधेरे कूऐं में धकेल रहे हैं ये जितनी जल्दी समझ लिया जाए उतना ही हम सब के लिए बेहतर होगा।आरक्षण के विरोधियों की आवाज भले ही सुनी ना जा रही हो लेकिन लगातार आवाज उठा कर उन्होने ये जता दिया है कि नेताओ को अपने हित साधने से रोकने वाली ताकत देश में मौजूद है ।

11 comments:

PD said...

100% agree..

Ankur Gupta said...

१००००% आपसे सहमत हूं. बस ये वर्ड वैरिफ़िकेशन हटा लीजिये.

दिलीप मंडल said...

कल्पना कीजिए ठीक इसी जगह एक ऐसे प्रदर्शन की जिसमें सिर्फ प्रदर्शनकारियों के चेहरे दूसरे हों। किसी बंद कारखाने के मजदूर या विस्थापित। फिर क्या पुलिस ऐसे ही प्यार से उठा-उठा कर उन्हें ले जाती या लाठियां बरसतीं या आंसूगैस के गोले चलते।

एम्स के इन महान छात्रों का आंबेडकर की रचनाएं जलाने के वीडियो देखा है आपने। वहां के सारे दलित छात्रों को एक हॉस्टल के दो फ्लोर पर रहना पड़ता है। उनके दरवाजों पर गालियां लिखी जाती हैं और प्लेग्राउंड में उन्हें जाने नहीं दिया जाता। एम्स में कोई देवता नहीं बसते। हमारे आपके जैसे लोग रहते हैं जो समाज की सारी बीमारियों के वैसे ही शिकार हैं जैसे बाकी लोग हैं।

Anonymous said...

दिलीप जी, आपकी मानसिकता मुझे तो बस ऐसा ही लगता है जैसे की जो लोग मेहनत नहीं करना चाहते हों उन्हें बस अर्श पर चढा दो क्योंकि वो दलित हैं.. अरे आरक्षण की बात ही करनी है तो जातियों को लेकर क्यों करते हैं?? बाते ही करनी है तो उनकी कीजिए जो पैसे से समर्थ नहीं हैं..

आप जैसे लोगों को समानता भी चाहिए और आरक्षण भी.. ना जाने कैसी सोच लेकर आप जैसे लोग बैठे रहते हैं.. और रही बात Polish की लाठियों की तो वो हर उस जगह गलत है जहाँ लोग बेकसूर हैं.. मुझे ये भी पता है की अभी आप जिन लोगों(डाक्टर) की बात कर रहे हैं कल जरूरत परने पर(किसी अपने का इलाज कराने के लिए) आप उन्हीं के आगे-पीछे घूमेंगे या पहले भी घूम चुके होंगे.. उस समय लाठियों की बात ना जाने कहाँ चली जायेगी..

मैं अनोनिमस बन कर इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि मैं समझदारों से बहस करना चाहता हूँ.. ऐसों सो नहीं जो किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हों..

Upadhyayjee said...

Well said. You dared to write. Other wise I have seen few ill educated folks uttering nonesense. Few MPs MLAs whose knowledge is well known, how can they decide fate of whole Indians? VP and Arjun they are the only knowledgable people on reservation. They are supported by sycophants and a weak PM. Why can't they do a study based on poverty and come out with reservation system. Shame on Indian democracy. Mandal don't justify by changing faces. Have imagined other few things. Just imagine and let me know.
1) Replace those faces with Mahadalits and Dalits demanding give all reservations to them.
2) Replace those faces from poors from other castes ( who do not get reservations). They will be asking when you brought creamy layer then why not include us in those non-creamy layers.
3) Hear those faces itself they will be saying what mistake I have done. If I have talent then what do you suggest? Do you want us to become droup outs and discontinue studies?
What's this decision? In 17-18 years you can't come out with a study on how economically backward people and plan reservation acordingly. Why are you so desparate to plan reservation based on almost quarter century old study for a political gain?

राज भाटिय़ा said...

क्या देश मे सिर्फ़ दलित, मुस्ल्मान, ओर इसाई ही गरीब हे ?बाकी सब राजे हे,सुखी हे,वाह क्या राजनीति हे,

दिलीप मंडल said...

भाटिया सर,

सवर्ण गरीबों को आरक्षण मिलना ही चाहिए। लेकिन आप ये मांग करके देखिए कि जनरल कटेगरी से सवर्ण क्रीमी लेयर को आउट कीजिए। ओबीसी सीटौं पर ओबीसी गरीब और जनरल सीटों पर जनरल गरीब। न्याय तो इसे ही कहेंगे न? गरीबों के लिए दर्द सिर्फ ओबीसी के मामले में, ये तो सवर्ण गरीबों के साथ नाइंसाफी हैं।

यूथ फॉर इक्वैलिटी में दम है तो ऐसा आंदोलन चला कर दिखाए। करें ऐसी मांग। करें इस मांग के लिए आत्मदाह। फिर देखिए कौन कहां खड़ा मिलेगा? मायावती जब सवर्ण गरीबों को आरक्षण देने की बात करती है तो कांग्रेस-बीजेपी का दम फूलने लगता है। सवर्ण इलीट किसी भी कीमत पर सवर्ण गरीब के लिए स्थान छोड़ने को तैयारन नहीं होगा।

भारतीय समाज काश कि उतना सरल होता, जितना कि कुछ लोग बताने की कोशिश कर रहे हैं। धन्यवाद।

गुस्ताख said...

दिलीप मंडल जी, मोहल्ले पर आपके वैचारिकता की कै बहुत दिनों से झेल रहा हूं। झेल इसलिए रहा था, कि आरक्षण के पीछे जो मूल भावना थी उससे कहीं न कहीं सहमत रहा हूं कि समाज के कमज़ोर लोगों को अवसर की समानता मिले। उनकी स्थिति में सुधार लाया जा सके। लेकिन दीपांशु ने बिलकुल सही कहा कि क्या पिछड़े सिर्फ दलित ही हैं? सभी जाति और वर्ण के लोगों को एक जैसी भूख लगती है और प्यास भी। ऐसे में समरस समाज और समान अवसर मुहैया कराने के वास्ते कुछ ऐसा उपाय किया जाना चाहिए जिसमें गरीबों को तरजीह मिले। वोटलोलुप नेताओं के झांसे में आकर हम जातिवाद की दीवार को तोड़ने की बजाय उसे और मज़बूत ही कर रहे हैं। जाति की दीवार को कमजोर करने के प्रयास कीजिए, हम आपके साथ हैं। क्या यह सुझाव संगत है कि आरक्षण तो मिले लेकिन योग्यता के साथ समझौता करके नहीं। कहने का गर्ज ये कि कट आफ लिस्ट में कोई समझौता न हो। हां, सीटें आरक्षित रहें आपके पसंद की जातियों के लिए ही, लेकिन कट ऑफ लिस्ट सामान्य वर्ग के छात्रों के बराबर ही हो। सहमत?

दिलीप मंडल said...

कृपया इसे देखें
'OBCs outscore general merit students'

timesofindia.indiatimes.com/articleshow/2070274.cms

इसके बाद ये जानें कि पिछले साल का आईएएस टॉपर आर मुत्याला राजू ओबीसी है और ये भी जान लें कि एम्स में सीनियर रेजिडेंट के एक्जाम का टॉपर दलित है। इसके बाद ये भी जान लें कि ये टॉपर कभी शिखर पर नहीं पहुंच पाते। मंत्रालयों में ए कटेगरी के पोस्ट में ये प्रतिभाशाली लोग क्यों नहीं दिखते। कहीं तो कोई घपला है। एम्स के इस साल के टॉपर को पसंद का ब्रांच नहीं मिला है।

भेदभाव के घपले बंद हों तो किसी को आरक्षण नहीं चाहिए। मेरिट की कमी कहां हैं। दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में कोटा सबसे ज्यादा है और वे राज्य सोशल डेवलपमेंट इंडेक्स में उत्तर भारत को काफी पीछे छोड़ चुके हैं।

गुस्ताख भाई, गरीब सवर्णों को आरक्षण के बारे में आपकी कोई राय है क्या?

गुस्ताख said...

एक राय बनाने की कोशिश कर रहा हूं और साथ ही साथ डर रहा हूं मंडल जी कि कहीं कि सवर्णों को महज इस आधार पर आरक्षण न दे दिया जाए कि वह सवर्ण हैं। उनका वोट की तरह इस्तेमाल हो जाने से डरता हूं। जातियों के आदार पर वोटों का ध्रुवी करण फौरी तौर पर सवर्णों या दलितों को सत्ता की राह भले दिखा दे लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे और वे निश्यच ही समाज के अहित में होंगे। अच्छा हो कि सभी वर्ग और धर्म के लोगो के लिए शिक्षा की बुनियादी और उच्च कोटि की व्यवस्था की जाए। मलाईदार परत के लोगों चाहे वह किसी भी जाति के हों- को सरकारी फायदे से वंचित रखते हुए असली ज़रूरतमंद को फायद पहुंचाया जाए। मुझे यकीन भी है और िसके खासे सुबूत भी हैं कि प्रतिभा जातिविशेष की संपत्ति नहीं होती। लेकिन हमें सव्वजन हिताय की चिंता करनी चाहिए। और गरीब लोगों के बारे में सोचना चाहिए उनके बारे मेंजो दो जून की रोटी नहीं जुटा पाते चाहे वह किसी जाति के हों। हमारी मानवीयता जाति या संप्रदाय के सांकल से बंद न हो तो बेहतर।

सुभाष said...

सच्चे अर्थों में न कोई पिछडों की सहायता करना चाहते और न उनके विकास के लिए कुछ करना चाहते है, हमारे राजनैतिक दलों को केवल अपनी राजनीती की रोटियां सेकनी है चाहे वह कोई भी राजनैतिक पार्टी क्योँ न हो. किसी के कोई सिधांत न रहे, न कोई उसूल. समय के साथ सब बदलता रहता है. आज मेरा दोस्त तो कल मेरा दुश्मन. आरक्षण अब ऐसा नासूर बन गया है कि अब या तो इसका कोई इलाज ही नही रह गया है या कोई इस समस्या को हल नही करना चाहता है, अगर इन समस्यों का कोई हल निकल जाएगा तो हमारी राजनेतिक पार्टियों के पास अपनी राजनीति करने के लिए रह ही क्या जाएगा, शायद हमारे सविधान बनाने वालों ने भी ये नही सोचा होगा कि जिस मकसद को लेकर उन्होंने इस आरक्षण की सहायता ली थी आज उसी पर हमारे देश की राजनीती पूरी तरह हावी हो जायेगी